
रायपुर. गीतांजलि श्री एवं डेज़ी रॉकवेल को उपन्यास ‘रेत समाधि’ हेतु अंतरराष्ट्रीय बुकर पुरस्कार मिलने पर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने बधाई देते हुए भविष्य में और सशक्त लेखन के लिए शुभकामनाएं दी हैं। उन्होंने कहा, इस पुरस्कार से हिंदी व हिंदी वालों का मान बढ़ा है। बता दें, डेज़ी रॉकवेल द्वारा हिंदी से अनुवादित गीतांजलि श्री के उपन्यास ‘ टॉम्ब ऑफ सैंड ‘ ( रेत समाधि ) ने 26 मई गुरुवार को अंतर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार जीता है। प्राइज के साथ भारतीय उपन्यासकार गीतांजलि और अनुवादक डेज़ी रॉकवेल को £50,000 (लगभग 49 लाख रुपए) भी प्राप्त हुए हैं।
क्या है बुकर पुरस्कार
इंटरनेशनल बुकर पुरस्कार (International Booker Prize) यूनाइटेड किंगडम (UK) में आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय साहित्यिक पुरस्कार है, जहां हर वर्ष यूके या आयरलैंड में प्रकाशित उपन्यास के अनुवादित काम के लिए प्राइज प्रदान किया जाता है। साहित्य की दुनिया में अनुवादकों का काम अकसर अनदेखा रह जाता है। यही कारण है कि अन्य भाषाओं में कथा साहित्य को बढ़ावा देने और अनुवादकों के काम को सलाम करने के लिए इस पुरस्कार की स्थापना की गई थी।
रेत समाधि बना बुकर प्राइज का पुरस्कार जीतने वाला पहला हिंदी उपन्यास
टॉम्ब ऑफ सैंड किसी भी मूल रूप से भारतीय भाषा में लिखी ऐसी पहली किताब है जिसे अंतर्राष्ट्रीय बुकर पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। यह उपन्यास 2018 में ‘रेत समाधि’ के रूप में प्रकाशित हुई थी। कहानी की मुख्य पात्र एक 80 वर्षीय महिला है जो कि नॉर्थ इंडिया (उत्तर भारत) में रहती है। कहानी में पाठकों को एक नयापन देखने को मिल रहा है। इसके अलावा गीतांजलि श्री भी बुकर प्राइज जीतने वाली पहली भारतीय लेखक हैं। श्री 30 से अधिक वर्षों से लेखन का काम करती आ रहीं हैं और उनकी पिछली तीन पुस्तकों का अंग्रेजी में अनुवाद किया जा चुका है। श्री की कई रचनाएँ सामाजिक-राजनीतिक घटनाओं और महिलाओं के अनुभवों के इर्दगिर्द घूमती हैं।
कैसे बनी गीतांजलि पांडे से गीतांजलि श्री
श्री का जन्म से नाम गीतांजलि पांडे था लेकिन उन्होंने अपना उपनाम बदल दिया। इस किस्से के बारे में श्री याद करते हुए कहती हैं कि किशोरावस्था में उन्हें अपना पहला बैंक खाता मिला था और बड़े उत्साह के साथ उन्होंने अपना पूरा नाम साइन किया था। लेकिन उनके पिता ने कहा, ‘नहीं, बस अपने पहले नाम पर हस्ताक्षर कर दो, क्योंकि शादी के बाद एक महिला का नाम बदल जाता है।‘ इस बात को बताते हुए श्री आगे कहती है कि उनके पिता बुरे नहीं थे, लेकिन यह स्मृति श्री के साथ रह गई। श्री ने सोचा, “मेरी माँ का नाम कहीं क्यों नहीं है? मां ने हमें पालने में इतनी बड़ी भूमिका निभाई है।“ इसलिए गीतांजलि ने जब कहानियां लिखनी शुरू की तो उन्होंने फैसला किया कि उनकी माँ का पहला नाम ही अब से उनका अपना दूसरा नाम होगा।
19 साल की उम्र तक हिंदी नहीं आती थी – अनुवादक डेज़ी रॉकवेल
रेत समाधि का अनुवाद करने वाली अमेरिकी महिला डेज़ी रॉकवेल ने 19 साल की उम्र तक हिंदी सीखना शुरू नहीं किया था। डेज़ी ने पहले भी भारत के कई बेहतरीन हिंदी लेखकों की किताबों का अंग्रेजी में अनुवाद किया है। एक इंटरव्यू के माध्यम से पता चला है कि टॉम्ब ऑफ सैंड के लिए अनुवाद की प्रक्रिया सहयोगात्मक थी। कोविड 19 महामारी के दौरान अमेरिका के वर्मोंट स्टेट में बैठी रॉकवेल और नई दिल्ली में श्री के बीच ईमेल के माध्यम से बातचीत हुआ करती थी। डेज़ी का कहना है कि गीतांजलि के लेखन का एक्सपेरिमेंटल नेचर और भाषा का अद्वितीय उपयोग ही कारण था कि इस किताब का अनुवाद करना डेज़ी के लिए सबसे कठिन रहा।
Updated on:
29 May 2022 07:25 pm
Published on:
29 May 2022 05:33 pm
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