
गुरु घासीदास जयंती विशेष: पहला जैतखाम गिरौदपुरी में 1842 में स्थापित किया गया, आज इनकी संख्या 50 हजार पार
रायपुर . सतनामी समाज आज रविवार को अपने आराध्य गुरु घासीदास की 266वीं जयंती मना रहा है। जैतखाम जो पूरे समाज के लिए पूजनीय है, पहली बार उसकी स्थापना बाबा ने ही 1842 के आसपास की थी। आज प्रदेशभर में 50 हजार से ज्यादा जैतखाम हैं। इस पवित्र स्तंभ का कितना महत्व है, इसका अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि इसकी पूजा किए बिना समाज में कोई भी शुभ काम नहीं किया जाता। शादी-ब्याह हो या बच्चे का जन्म, नए घर में प्रवेश से लेकर नए व्यापार की शुुरुआत तक, सभी कार्य जैतखाम की पूजा के बाद ही किए जाते हैं।
266वीं जयंती के मौके पर पत्रिका ने जैतखाम का इतिहास खंगाला तो पता चला कि गुरु घासीदास ने 1842 में समाज को अपना पहला संदेश दिया था। इसी के आसपास उन्होंने गिरौदपुरी और सोनाखान के जंगलों में पहले जोड़ा जैतखाम की स्थापना की थी। जोड़ा जैतखाम उसे कहते हैं जिसमें एक चबूतरे पर दो स्तंभ की स्थापना की जाती है। समाज के जानकारों की मानें तो बाबा का पहला प्रवचन सुनने के लिए 70 हजार से अधिक लोग जुटे थे। यहीं से जैतखाम का प्रचार-प्रसार हुआ और समाज ने इसे अपना सबसे पवित्र चिन्ह मानकर घर से लेकर गांव, नगर और शहरों तक इसकी स्थापना शुरू की।
सबसे ऊंचा जैतखाम 70 फीट का तो रायपुर में सर्वाधिक 40 फीट
डॉ. जेआर सोनी ने बताया, विश्व का सबसे ऊंचा जैतखाम गिरौदपुरी धाम में स्थापित है। इसकी ऊंचाई 77 फीट के करीब है। इसके दोनों तरफ 435-435 सीढ़ियां हैं। दोनों सीढ़ियों की विशेष बात यह है कि दोनों अलग अलग हैं, फिर भी दूर से देखने पर एक-दूसरे के ऊपर जान पड़ती हैं। राजधानी में 100 से ज्यादा जैतखाम स्थापित हैं। इनमें सबसे ऊंचा जैतखाम 40 फीट का है और इनकी संख्या 2 से 3 है।
जैतखाम के स्वरूप से समझिए महत्व...
1.चबूतरा: प्राचीन समय में चबूतरा मिट्टी का बनता था, लेकिन आधुनिकता के प्रभाव के कारण अब यह ईंट व सीमेंट का बनाया जाता है। चबूतरे के समक्ष ज्योति कलश जलाकर आरती की जाती है।
2. खंभा या खाम: यह 21 हाथ लंबी लकड़ी का गोला होता है। अमूमन इसे सरई लकड़ी से बनाया जाता है। अब अन्य लकड़ियों से भी जैतखाम बनाया जाने लगा है। ऊपर लगी कांसे की टोपी मर्यादा का प्रतीक है। आजकल लकड़ी की जगह सीमेंट और लोहे के जैतखाम भी बनाए जाने लगे हैं।
3. बांस का डंडा: यह 7 हाथ की लंबाई वाला ठोस बांस से बनता है। इसे चिकना बनाया जाता है। इसकी गांठें मानवीय गुण सत्य, करुणा, प्रेम और क्षमा को दर्शाती हैं। साथ ही अपनी तथा दूसरों की सच्ची सेवा और रक्षा करने का पाठ भी पढ़ाती हैं।
4. हुक और कील: यह लोहे या अन्य धातु से बनता है। पहले दो हुक होते थे क्योंकि पहले जैतखाम भी आकार में छोटा होते थे। ये हुक सफेद ध्वज (पालों) के हवा में लहराने और उसकी कंपन को सहन कर लेते थे।
5. सफेद ध्वज: यह सफेद कपड़े का बना होता है जो आयताकार होता है। इसका कपड़ा श्वेत, स्वच्छ और मोटा होता है। पताखा की लंबाई 2/3 और चौड़ाई 1/3 के अनुपात में होती है। श्वेत ध्वज को समाज में पालो के नाम से भी जाना जाता है।
(जैसा गुरु घासीदास साहित्य एवं संस्कृति अकादमी के प्रवक्ता चेतन चंदेल ने बताया)
Published on:
18 Dec 2022 02:57 pm

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