
IGKV Raipur: 14 हजार हैक्टेयर जमीन को बताया था मखाने का स्वर्ग, अब 1 एकड़ फसल भी नहीं बची
Chhattisgarh News। गौरव शर्मा: इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (आईजीकेवी) ने 7 साल पहले धमतरी की 14 हजार हैक्टेयर जमीन को मखाने की खेती के लिए फायदेमंद बताया था। नजीर पेश करने कृषि विज्ञान केंद्र की 10 एकड़ जमीन पर खुद खेती भी की। किसानों ने भरोसा किया तो किसी ने आधा-एक तो किसी ने 5-7 एकड़ जमीन पर मखाना उगाया। आज हालात ये हैं कि धमतरी के खेतों में दूर-दूर तक मखाने का नामोनिशां नहीं है। यहां तक प्रोसेसिंग यूनिट पर भी ताला लग गया है।
धमतरी में मखाने की खेती शुरू करने का प्रोजेक्ट शुद्ध रूप से कृषि विश्वविद्यालय का था। धमतरी की जमीन चूंकि डबल फसल के लायक है, जो मखाने की खेती के लिए उपयुक्त है। वहीं बाजार में मखाना प्रति किलो 8 हजार रुपए के करीब बिकता है। ऐसे में 2017 में तत्कालीन भाजपा सरकार ने इस खेती को बढ़ावा दिया।
ट्रेनिंग के लिए दरभंगा गई थी टीम
खास इसी के लिए धमतरी में कृषि विज्ञान केंद्र धमतरी की स्थापना की गई। विवि के तत्कालीन कुलपति ने मखाने की खेती की ट्रेनिंग के लिए एक टीम को दरभंगा अनुसंधान केंद्र भी भेजा। टीम के लौटने के बाद धमतरी में कृषि विज्ञान केंद्र की जमीन पर पहली बार मखाना उगाया गया। किसानों से भी कहा गया कि वे अपने खेतों में इसकी फसल लें। विश्वविद्यालय का कहा मानकर कई किसान आगे आए। 50 एकड़ से ज्यादा जमीन पर खेती की। कांग्रेस की सरकार ने भी इसे बढ़ावा दिया। मखाने की प्रोसेसिंग लोकल लेवल पर हो, इसके लिए 2019 में धमतरी में एक प्रोसेसिंग यूनिट खोला गया। यहां मशीन ही तकरीबन 10 लाख रुपए की इंस्टॉल की गई थी। आज इस यूनिट पर ताला लगा है और मशीनें पड़े-पड़े कबाड़ हो रही हैं।
इसलिए फ्लॉप… मखाना उगवा तो लिया लेकिन बिकवा नहीं पाए
धमतरी में मखाने की खेती फ्लॉप होने का एकमात्र कारण ये है कि कृषि विश्वविद्यालय ने किसानों से फसल तो उगवा ली, लेकिन इसे बिकवा नहीं पाए। बताते हैं कि मखाने को बेचने के लिए कांग्रेस सरकार में बिहान ग्रुप से एग्रीमेंट किया गया था। तय हुआ था कि सारी फसल बिहान समूह की महिलाओं को दी जाएगी जिसे वे बाय प्रोडक्ट के रूप में बेचेंगी। लेकिन, कोरोनाकाल के दौरान बिहान ने मखाना खरीदने से इनकार कर दिया। नतीजतन जिन किसानों ने इसकी खेती की थी, उनके पास सिर पीटने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा।
विवि को 25 लाख रुपए मिलते रहे, इधर, फसल का रकबा घटता गया
मिली जानकारी के मुताबिक सरकार ने मखाने की खेती की देखभाल और इसे बढ़ावा देने के लिए इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय को हर साल 25 लाख रुपए दिए। विश्वविद्यालय को हर साल ये पैसे मिल रहे थे कि वे इस खेती का रकबा बढ़ाएं। लेकिन, हुआ उल्टा। मखाने का रकबा साल दर साल घटता ही गया। आज स्थिति ये है कि खुद विश्वविद्यालय के कृषि विकास केंद्र की एक एकड़ जमीन पर भी मखाना नहीं है।
मखाने की खेती की प्रक्रिया काफी जटिल है। इसके लिए स्किल्ड लेबर की जरूरत पड़ती है, जो ज्यादातर बिहार से आते हैं। इसके अलावा कई बार फसल के लिए मार्केट भी नहीं मिलता। ये वो तमाम वजहें है जिसकी वजह से धमतरी में शुरू किया गया मखाने का प्रोजेक्ट सक्सेसफुल नहीं हो पाया। -अजय वर्मा, निदेशक, विस्तार सेवाएं, आईजीकेवी
Published on:
18 Feb 2024 12:09 pm

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