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जब कांग्रेस ने किया वामदलों का समर्थन, तब इंदिरा गांधी को सुनने पड़े थे विरोध के स्वर

वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ में वामपंथी पार्टियों ने तकऱीबन 23 सीटों पर चुनाव लड़ा था और सभी सीटों पर हार गई थी।
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रायपुर

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Ashish Gupta

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Updated: 8 Oct 2018, 5:09 PM IST

lok sabha election 2019

Indira Gandhi

रायपुर. वर्ष 2013 के विधानसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ में वामपंथी पार्टियों ने तकऱीबन 23 सीटों पर चुनाव लड़ा था और सभी सीटों पर हार गई थी। लेकिन जो चीज चौकाने वाली थी वो यह थी कि सीपीआई जिसने 13 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे 5.15 फीसदी वोट हासिल करने में सफल रही। दिलचस्प यह है कि लड़ी गई सीटों पर वोट हासिल करने में कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया तीसरे नंबर पर रही थी।

पिछले तीन विधानसभा चुनाव से वामपंथी पार्टियाँ एक भी सीट पर चुनाव नहीं जीत सकी है। लेकिन एक वक्त था जब अविभाजित मध्य प्रदेश में ही नही रायपुर से लेकर बस्तर तक वामपंथी दलों का जबरदस्त बोलबाला था ।कहने वाले तो यहाँ तक कहते हैं कि छत्तीसगढ़ में माओवादी आन्दोलन के पनपने के पीछे शोषण उत्पीड़न की कहानियाँ तो थी ही वामपंथ ने भी आदिवासी मजदूर किसानों को विरोध करने की ताकत देने में मदद की है।

23 सीटों पर लड़ेंगी वामपंथी पार्टियां
इस विधानसभा चुनाव में भी वामपंथी एक बार फिर 23 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने जा रहे हैं इनमे ज्यादातर सीटें बस्तर की है, कुछ एक सीटें सामान्य इलाकों के लिए हैं अविभाजित मध्यप्रदेश में वामपंथी आन्दोलन की ताकत इस कदर थी कि सीपीआइ के पूर्व महासचिव स्वर्गीय ए बी बर्धन आजादी से पहले मध्य प्रदेश प्रांत के महासचिव थे 1972 में रायपुर सीट से सुधीर मुखर्जी चुनाव जीते थे लेकिन मजेदार यह था कि वे सीपीआई की जगह बतौर निर्दलीय उम्मीदवार लड़े थे छत्तीसगढ़ में हुए पिछले तीन चुनावों में वामपंथी पार्टियां एक भी सीट नहीं जीत पाई हैं। लेकिन आज भी मनीष कुंजाम का नाम छत्तीसगढ़ की राजनीति में बेहद सम्मान से लिया जाता है बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद 1993 में मध्यप्रदेश विधानसभा के चुनाव में मध्य प्रदेश से सीपीआई के दो विधायक चुनाव जीते थे।

कभी इनका भी था जोर
आजादी के बाद रायगढ़ में वामपंथियों ने मजदूरों की बड़ी लड़ाई लड़ी थी । यहाँ की तमाम औद्योगिक इकाइयों में 70 के दशक में तमाम वामपंथी ट्रेड यूनियन अस्तित्व में आ गई गई जिनमे सीटू और एटक का जमकर बोलबाला था 1988 में रायपुर में वामपंथियों की एतिहासिक हड़ताल हुई थी। । राज्य में सीपीएम का मत प्रतिशत कभी बहुत ज्यादा नहीं रहा । लेकिन एक वक्त वही भी था कि सीपीएम के संजय पराते नारायणपुर से चुनाव लड़ते थे और हर बार दूसरे स्थान पर रहते थे। भिलाई में 1985 में पीके मोइत्रा कांग्रेस के रवि आर्य से महज 1231 मतों से से हारे थे। बताया जाता है कि कांग्रेस से निष्कासित नेता मंतूराम पवार भी सीपीएम से लड़ते थे। 1990 में सरगुजा लोकसभा सीट से सीपीआइ की जगमनी देवी को 50 हजार वोट मिले थे।

जब रायपुर में कांग्रेस ने किया वामदलों का समर्थन
छत्तीसगढ़ में सुधीर मुखर्जी का वर्चस्व किस कदर था इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1972 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने सुधीर मुखर्जी के समर्थन करने का फैसला किया था जिसको लेकर स्वर्गीय इंदिरा गांधी तक पर सवाल उठाये गए थे आलम यह था कि इंदिरा गांधी को सेन्ट्रल इलेक्शन कमेटी में विरोध के स्वर सुनने पड़े थे जिसके बाद इंदिरा गांधी ने कहा था कि रायपुर सीट के लिए फैसला बाद में लिया जाएगा लेकिन हुआ यह कि कांग्रेस ने रायपुर सीट के लिए प्रत्याशी तो घोषित किया लेकिन बाद में आदेश देकर कांग्रेस के प्रत्याशी से नामाकंन वापस ले लिया गया और सुधीर मुखर्जी का चुनाव में कांग्रेस ने समर्थन देने का ऐलान कर दिया।

लास्ट कामरेड ऑफ छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ में बिलासपुर, कांकेर, राजनांदगांव, भिलाई, कोटा समेत कई सीटों पर वामपंथी दल लम्बे समय तक मजबूत स्थिति में रहे हैं। यहाँ की वामपंथी राजनीति में एक बड़ा नाम मनीष कुंजाम का है 1993 में कोंटा से सीपीआई के मनीष कुंजाम और दंतेवाड़ा से नंदराम सोरी 189 मतों से चुनाव जीते थे। 2008 में मनीष कुंजाम ने सीट बदल थी वह दंतेवाड़ा में महेंद्र कर्मा के खिलाफ मैदान में उतरे। वह चुनाव भाजपा जीत गई। इसी चुनाव में कोंटा की अपनी सीट मनीष ने रामा सोढ़ी को दी थी। रामा सोढ़ी ने कांग्रेस को कड़ी टक्कर दी लेकिन कवासी लखमा से मामूली अंतर से हार गए। इस चुनाव में मनीष कुंजाम फिर से चुनाव में उतरने की तैयारी में हैं देखना होगा वो माओवादी गढ़ में कितना जोर दिखा पाते हैं।