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इस मंदिर में हैं देवी को पत्थर चढाने की अनोखी परंपरा, 5 पत्थर चढ़ाने से प्रसन्न होती हैं माता

भारत में ऐसे कई मंदिर हैं जहां प्रसाद के रूप में देवी-देवताओं को अलग-अलग तरह की और कुछ अजीब चीजें भी चढ़ायी जाती हैं. लेकिन क्या भगवान को प्रसाद के रूप में कंकड़-पत्थर अर्पित किए जा सकते हैं? एक ऐसे ही मंदिर की जहां देवी मां को भोग और प्रसाद के रूप में नारियल या फल-फूल नहीं बल्कि कंकड़ और पत्थर का चढ़ावा चढ़ाया जाता है.

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बिलासपुर. शहर से लगे खमतराई में देवी का ऐसा अनोखा मंदिर है, जहां माता सिर्फ 5 पत्थर के चढ़ावे से प्रसन्न होकर अपने भक्तों की मनोकामना पूरी करती हैं। वनदेवी प्रतिरूप की यहां स्थानीय बोली में बगदाई के नाम से पूजा की जाती है। स्थानीय निवासियों के अनुसार इस अनोखी परंपरा का पालन सदियों से किया जा रहा है। यहां मन्नत मांगने वालों और दर्शनार्थियों का आगमन पूरे साल होता है।

पर नवरात्रि में संख्या बढ़ जाती है। मंदिर के पुजारी रामकुमार त्रिपाठी बताते हैं कि वनदेवी के मंदिर में पांच पत्थर चढ़ाने की अनोखी प्रथा यहां सदियों से है। एक समय यह यहां बरगद के पेड़ों के बहुतायत थी। मंदिर में समय के अनुसार बदलाव होने पर भक्त फूल,माला और पूजन सामग्री भी लाने लगे हैं पर प्रमुख रूप से पांच पत्थर ही अर्पित किए जाते हैं।

देवी मां को पांच पत्थरों का चढ़ावा चढ़ता है
श्रद्धालु इस मंदिर में फूल-माला या पूजन सामग्री लेकर नहीं बल्कि पांच पत्थर लेकर आते हैं और देवी मां से अपनी मनोकामना कहते हैं. ऐसी मान्यता है कि वनदेवी के इस मंदिर में सच्चे मन से पांच पत्थर चढ़ाने वाले श्रद्धालु की मनोकामना जरूर पूरी होती है. मन्नत पूरी होने के बाद एक बार फिर श्रद्धालु मंदिर में पांच पत्थरों का चढ़ावा चढ़ाते हैं. हालांकि यहां मंदिर में वन देवी को कोई भी साधारण पत्थर नहीं चढ़ाया जा सकता बल्कि खेतों में मिलने वाला गोटा पत्थर ही चढ़ाया जाता है.

स्वयंभू मानी जाती है प्रतिमा
पुजारी अश्वनी तिवारी व संरक्षक पाटनवार ने बताया कि ग्राम खमतराई में एक जमाने से घनघोर जंगल हुआ करता था। इस क्षेत्र से गुजरने वालों को दिव्य शक्ति महसूस होती थी। मान्यता के अनुसार यहां लोगों को पेड़ों के नीचे अनगढ़ पत्थर मिलाए जिसमें से रोशनी निकल रही थी। खुले में इसे स्थापित कर पूजा की जाने लगी। लोगों को मिली प्रेरणा के अनुसार आसपास खेतों में मिलने वाले विशेष पत्थर अर्पित किए जाने लगे। मनोकामना पूरी होने पर आस्था बढ़ने लगी। लगभग 5 साल पहले मूर्ति को आकृति दी गई।