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नांगर – बइला नदावत हे

खेती-किसानी

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नांगर - बइला नदावत हे

एक जमाना रहिस हे जब हमर सियानमन पानी गिरे के पंदरा दिन पहिली ले नांगर बख्खर ल सजावय। बइलामन ल बने-बने चारा-पानी दे के तइयार करंय। चतवार, तुतारी ल छोल-चांच के बनावंय। नवा डोरी के कांसड़ा बनावंय। नांगर लोहा ल लोहार घर पजवाय बर लेगंय। धीरे.धीरे पानी घलो गिरे ल धर लेवय। होत बिहनिया खेत-खार रेंग देवंय। दिनभर कमा के बेरा बुड़त घर आवंय।
जइसे-जइसे नवा-नवा जिनिस अउ नवा-नवा मसीन आय ल धर लिस। तब ले हमर ये जुन्ना परंपरा ह नदागे। जिहां पहिली खेत म अरा...तता... के गीत गुंजय, आज उहां टेकटर बोंबियावत हे। आज कोनो मेर नांगर-बइला देखे ल नइ मिलय। सब टेकटर म बोवई-जोतई करत हें।
जब ले गियान-बिग्यान अउ मसीन के जमाना अइस तब ले हमर सोच घलो ह मसीन होगे हे। घुरवा के खातु ल छोड़ मनखे नवा- नवा रसायनिक खातु अउ दवई ल छींंच के भुइंया के उपजाऊपन ल कम कर दिस। पहिली पंदरा दिन धान बोवई चलय। तहान पंदरा दिन ले बियासी करंय। फेर अब एके दिन म सब्बो काम ल करे ले मनखे ह अलाल होवत हे। कोठा म ओइले-ओइले बइलामन घलो अलाल होवथे।
हमर छत्तीसगढ़ी के परसिद्ध कवि जीवन यदु के सुग्घर गीत ह सुरता आवत हे-
कर दे हरियर खेत-खार ल।
किरिया हमर ये जांगर के।
भुइंया ह रद्दा जोहत हे।
तोर-मोर अउ नांगर के।
फेर आज कहूं ये गीत ल ग देबे त लाज लागथे। हमर जुन्ना गीतमन संस्करीति अउ परंपरा ले जुड़े रहंय। जेमा गांव ह झांकय। समे के संग परिवरतन होइस अउ अइसन गीतमन समाज ले दुरिहावथ गिस। आज मनखे ह अपन पुरखा के संस्करीति ल छोड़त हे अउ बिदेसी संंस्करीति ल अपनावत हे। दूसर देस के गुन गावत हे अउ अपन देस के ल जुन्ना होगे काहत हे।
हमर किरिसी परधान देस म सबले जादा आय खेती ले होथे। फेर मनखे के सुवारथी सुभाव के सेती खेती ह परिया परथे। मनखे भले कतको उन्नति कर लेवय, फेर अपन संस्करीति अउ परंपरा ल नइ भुलाय बर चाही। संस्करीति हमर आत्मा ए जेमा हमर तन-मन धड़कथे। आज जादा जरूरत हे हमर जुन्ना परंपरा अउ संस्करीति ल फेर लाय के। हमर छत्तीसगढ़ के भुइंया म नांगर-बइला ले खेती करे के। तभे हमर किसान के भाग ह जागही अउ ये भुइंया ह हरियाही। वोकरे सेती कहे गे हे-
धर के तुतारी नांगर बइला संग।
बद ले रे मीत-मितानी।
चारदीनिया के पाछू झन पर।
नहीं ते बिगड़ जाही रे तोर किसानी।