
समय से पहले जन्म लेने वाले बच्चों का सिकुड़ जाता है फेफड़ा
रायपुर@ इंडियन कॉलेज ऑफ रेडियोलॉजी एंड इमेजिंग द्वारा फाफाडीह स्थित एक होटल में आयोजित दो दिवसीय डॉ. राजेंद्र राव सीएमई एवं कॉन्फ्रेंस हुई। कॉन्फ्रेंस के समापन पर आज बाल चिकित्सा में बी स्कैन की भूमिका पर सीनियर रेडियोलॉजिस्ट एवं आईआरआईए सीजी चैप्टर के सचिव डॉ. आनंद जायसवाल ने कहा कि कई बच्चों के आंखों में ट्यूमर होता है। कई बच्चों के आंखों के अंदर खून का रिसाव हो जाता है, नवजात मोतियाबिंद हो जाता है, हेमेंजियोमा (नसों का गुच्छा) बन जाता है, उसको बी-स्कैन अल्ट्रासोनोग्राफी (यूएसजी) के ज़रिए पता लगा सकते हैं। यह नेत्रगोलक के पीछे के हिस्से के घावों के निदान के लिए एक सरल प्रक्रिया है। रेटिना डिटेचमेंट, रेटिनोब्लास्टोमा जैसी सामान्य स्थितियों का सटीक मूल्यांकन इस पद्धति से किया जा सकता है। पीजीआई चंडीगढ़ से आए डॉ. कुशाल जीत सिंह सोढ़ी ने नियोनेटल रेस्पिरेटरी डिस्ट्रेशन पर कहा कि नवजात शिशु में होने वाली सांस की समस्या को एक्स-रे के द्वारा पता लगाकर समय पर इलाज किया जा सकता है। समय से पूर्व पैदा होने वाले नवजात शिशुओं के फेफड़ों में सरफेक्टेन्ट नहीं बनता है अर्थात सरफेक्टेन्ट की कमी होती है। इसके कारण उनको हाइलाइन मेम्ब्रेन डिजीज होती है। इस बीमारी की वजह से उनके फेफड़े में सिकुड़न रहती है, जिसे एक्स-रे के माध्यम से पता लगाकर प्रारंभिक अवस्था में ही ठीक किया जा सकता है।
सिकलसेल में नसों में सिकुड़न से ब्लड सप्लाई कम
आंबेडकर अस्पताल के अधीक्षक एवं विशेषज्ञ डॉ. एसबीएस नेताम ने सिकल सेल के मरीजों में ट्रांसक्रेनियल डॉप्लर विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि सिकलसेल बीमारी में मस्तिष्क की नसों में होने वाले परिवर्तन को सोनोग्राफी से पता लगाया जा सकता है। सिकलसेल में एमसीए वेसल की वेलोसिटी को ट्रेस करके, मस्तिष्क की नसों में होने वाले सिकुड़न के आधार पर प्रारंभिक अवस्था में ही रोग को पहचान सकते हैं। इस रोग में नसों में सिकुड़न आता-जाता है और ब्लड सप्लाई कम होता जाता है।
Published on:
27 Nov 2022 10:06 pm
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