
Children advocating for education rights(photo-patrika)
RTE Admission 2026: छत्तीसगढ़ के गरीब बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने के लिए लागू शिक्षा का अधिकार कानून का प्रदेश में जमीनी हकीकत यह है कि सत्र 2025-26 में 6352 सीटें खाली रह गई। यानि इतने गरीब बच्चों को निजी स्कूलों में पढऩे का मौका नहीं मिल पाया।
सूचना के अधिकार से मिली जानकारी में खुलासा हुआ है कि प्रदेश में सैंकड़ों गरीब छात्र शिक्षा के अधिकार से वंचित रह गए, जबकि निजी स्कूलों में सीटें खाली पड़ी हैं। हैरानी की बात यह है कि 33 जिलों में सिर्फ राजनांदगांव और खैरागढ़-छुईखदान में ही सीटें पूरी भर सकीं, जबकि राजधानी रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग और जांजगीर-चांपा जैसे बड़े शहरों के निजी स्कूलों में भी स्थिति ठीक नहीं है।
एसोसिएशन ऑफ सोशल एंड आरटीआई एक्टिविस्ट के अध्यक्ष संजय थुल ने इस मामले पर राज्य सरकार को पत्र लिखा है, जिसमें कहा गया है कि इतनी बड़ी संख्या में सीटों का खाली रहना आरटीई अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। इसके संभावित कारणों में आवेदन प्रक्रिया में देरी, जागरुकता की कमी, सत्यापन/लॉटरी प्रक्रिया में समस्याएं, स्कूलों का सहयोग न करना या निगरानी एवं क्रियान्वयन में प्रशासनिक कमियां शामिल हो सकती हैं।
प्राइवेट स्कूल मैनेजमेंट एसोसिएशन अध्यक्ष राजीव गुप्ता ने कहा की कई नियमों में फेरबदल की जरूरत है। हमने सरकार से मांग की है कि आरटीई की सीटों में कमी न की जाए। एडमिशन के लिए 2011 के सर्वे सूची मान्य की गई है, जबकि वास्तविक गरीबों की पहचान वर्तमान समय के मुताबिक होनी चाहिए।
जले का नाम कुल सीट कुल दाखिला कुल रिक्त
आंकड़ों पर गौर करें तो बस्तर, कोंडागांव, बीजापुर, नारायणपुर, सुकमा में भी गरीब बच्चों को शिक्षा के अधिकार कानून के तहत एडमिशन नहीं मिल पाया। आदिवासी क्षेत्रों के कई जिलों के स्कूलों में पर्याप्त आवेदन नहीं मिले, वहीं कई जिलों में स्क्रूटनी में भी बच्चों को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। सुकमा में 37, दंतेवाड़ा में 21 और नारायणपुर में 13 सीटें खाली रह गई।
Published on:
28 Mar 2026 02:10 pm
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