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मशहूर शायर मंजर भोपाली ने की मन की बात, कहा – मंचीय शायरी का सबसे बुरा दौर

रायपुर के रोटरी हैरिटेज में अपनी शायरी के रंग घोलने पहुंचे मंजर भोपाली के नाम से मशहूर शायर की पत्रिका से बातचीत के प्रमुख अंश।

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Famous Shayar Manzar Bhopali

मंजर भोपाली ने की मन की बात, कहा - मंचीय शायरी का सबसे बुरा दौर

ताबीर हुसैन/रायपुर. टैलेंट तो बचपन से ही दिखाई देने लगता है। पारखी लोग इसे समझने भी लगते हैं। कह भी दिया जाता है कि ये आगे चलकर कुछ न कुछ जरूर बनेगा। बालपन से ही किताबों से लगाव होना, फूलों से नजदीकी होना, संजीदगी नजर आना, ये एेसे लक्षण हैं जिसे देखकर मोहल्ले वाले कहने लगते हैं कि आपका बच्चा तो आगे चलकर आर्टिस्ट बनेगा।

ये बातें हकीकत से करीब होते दिखाई देती है जब वह मासूम आठवीं तक पहुंचते-पहुंचते शेर कहने लगता है। ये बातें सच्चाई से रूबरू होने लगती है जब वही बच्चा मुशायरों में न सिर्फ शिरकत करे अलबत्ता वाहवाही भी लूटने लगे। यहां बात हो रही सय्यद अली रजा की, जो मंजर भोपाली के नाम से मशहूर हैं। हाल ही में वे रायपुर के रोटरी हैरिटेज में अपनी शायरी की रंग घोलने पहुंचे। उर्दू और हिंदी की दर्जनभर किताबों और तकरीबन उतने ही नेशनल/इंटरनेशनल अवार्ड हासिल कर चुके मंजर साहब से बातचीत के प्रमुख अंश।

शायरी आज किस मुकाम पर है?
आज की जो मंचीय शायरी है वह बिल्कुल ही निचले स्तर पर है। सियासत, भड़ास और गालियों के अलावा कुछ नजर ही नहीं आता। मैंने ६० साल में एेसा दौर कभी नहीं देखा। अगर आप शायरी में सियासत को इन्वाल्व करते रहे तो इसका भी वही हश्र होगा जो आज पॉलिटिक्स का हुआ है।

रियलिटी शो, स्टैंडअप कॉमेडी और इंटरनेट से कोई फर्क?
मेरे हिसाब से रियलिटी शो सरीखी चीजों से शायरी को कोई मतलब नहीं है, क्योंकि इसके चाहने वाले अलग ही हैं। रही बात इंटरनेट की तो मैं समझता हूं हमें दौर के साथ खुद को अपडेट करते रहना चाहिए। पहले एेसा होता था कि हमने कुछ शेर लिखा तो दो साल बाद वह अमेरिका पहुंचता था। अब एेसा है कि दो मिनट में लिखी या पढ़ी गई बात सात समंदर पार चली जाती हैं। फ्यूचर इसी का है।

आपने विदेश में कब पेशकश दी?
1983-84 में मैंने स्कूल में पहली गक़ाल लिखी। इसके बाद मुशायरों में शामिल होने लगा। पहला इंटरनेशनल परफार्मेंस 1987 में पाकिस्तान में दी। अब तक अमेरिका, इंग्लैंड, कनाडा, पाकिस्तान, इरान, सउदी अरबिया, ओमान, दोहा-कतर, यूएई, अफ्रीका, नार्वे, हॉलेंड, मलेशिया व सिंगापुर में शेरो-शायरी की मिठास घोल चुके हैं।

नए शायरों को क्या मैसेज देंगे?
आज की पीढ़ी गुमराह हो चली है। उसे किसी से कुछ पूछने पर भी गुरेज होने लगा है। हमारे टाइम पर एेसा था कि कुछ लिख लिया तो उस्ताद को जाकर जरूर सुनाते, पर एेसा आज नहीं होता। जो समझ में आ रहा है सोशल मीडिया में पोस्ट कर दिया जाता है। मेरी राय है कि यूथ खूब मेहनत करें। जितना ज्यादा हो सके अच्छे लिखने वालों को पढ़ें। कुछ बात समझ में न आए तो जानकारों से मिलकर पूछें।