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तो इसलिए मौत की गुत्थी रह जाती है अनसुलझी

राज्य विभाजन के समय 26 प्रतिशत कर्मचारी, अपराधों की छानबीन तो दूर बैठने के लिए जगह तक नहीं
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विकास सोनी@रायपुर. प्रदेश का एकमात्र मेडिकोलीगल संस्थान राज्य विभाजन के बाद से ही प्रशासनिक लापरवाहियों के कारण अपने पतन की ओर अग्रसर हो रहा है। राज्य में कानून की विधा से जुड़े लोगों को प्रशिक्षण देने व जटिल अपराधों की छानबीन करने बना यह संस्थान, एक छोटे से कमरे मात्र से संचालित हो रहा है। इसके पास प्रशिक्षण देने के लिए न तो पर्याप्त जगह है और न ही इंवेस्टिगेशन करने की लैब। यहां तक कि 4 कर्मचारियों से प्रदेश में शुरू हुआ यह संस्थान आज 5 कर्मचारियों के साथ कार्य कर रहा है, जबकि 2005 में 30 पदों पर भर्ती की स्वीकृति प्राप्त हुई थी। इन समस्याओं को लेकर प्रभारी निदेशक विकास धु्रव ने निरंतर उच्चाधिकारियों को अवगत कराया, पर आज तक इन समस्याओं का निदान नहीं किया गया। प्रशासनिक लापरवाही के चलते यह संस्थान आज कार्य करने में अक्षम है, जिससे सबूतों के अभाव में या तो अपराधी बरी हो सकता है या फिर कोई निर्दोष सजा का भागीदार बन सकता है।

विभाजन के बाद से न के बराबर हुई ट्रेनिंग
प्रभारी निदेशक ने बताया कि विभाजन से पूर्व संयुक्त मध्यप्रदेश में हर निश्चित समयांतराल में अधिकारियों की टे्रनिंग की व्यवस्था की जाती थी, जबकि विभाजन के बाद संसाधनों के अभाव के कारण न के बराबर प्रशिक्षण दिया गया है। कुछ समय पूर्व हुई ऑल इंडिया पुलिस समिट में आठ से दस पुलिस के आला अधिकारियों की टे्रनिंग कराई गई थी।

यह है मेडिकोलीगल संस्थान
1964 में भारत सरकार ने मेडीकोलीगल सर्वे कमेटी का गठन किया, जिसने अपनी रिपोर्ट में प्रत्येक राज्य की राजधानी में गृह विभाग के अंतर्गत चिकित्सा महाविद्यालय के साथ इस संस्थान की स्थापना करने की अनुशंसा की। इसी तर्ज पर 1977 में भोपाल में देश का पहला संस्थान स्थापित किया गया। इसका प्रमुख कार्य अपराध व न्याय की विधा से जुड़े अधिकारियों (पुलिस, मजिस्ट्रेट, डॉक्टर) आदि को छानबीन करने के लिए प्रशिक्षण प्रदान करना और इसके साथ ही बड़े से बड़े जटिल मामलों में छानबीन कर विशेषज्ञ अभिमत प्रस्तुत करना है।

2002 से अस्तित्व में
राज्य विभाजन के बाद केंद्र सरकार के निर्देशानुसार २६ प्रतिशत कर्मचारियों के साथ इस विभाग को मप्र से अलग कर छत्तीसगढ़ में स्थापित किया गया था, जिसमें 4 कर्मचारी प्राप्त हुए। एक कर्मचारी मृत हो गया और एक सेवानिवृत्त, जिसके बाद संस्थान में मात्र तीन कर्मचारी शेष बचे और पिछले वर्ष के अंत में एक कर्मचारी की नियुक्ति की गई। जबकि 2005 में 30 पदों पर स्वीकृति प्रदान की गई थी और अब तक एक को छोड़ किसी की नियुक्ति नहीं की गई।

04 कर्मचारियों के साथ कार्य कर रहा है

05 कर्मचारियों से प्रदेश में शुरू हुआ यह संस्थान

2005 में 30 पदों पर भर्ती की स्वीकृति प्राप्त हुई थी