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ये है छत्तीसगढ़ का मदकू द्वीप, जहां दबे हैं 11वीं सदी की सभ्यता के रहस्य

मदकू द्वीप की खुदाई में 6 शिव मंदिर, 11 स्पार्तलिंग और एक-एक उमा-महेश्वर और गरुड़ारूढ़ लक्ष्मी-नारायण मंदिर मिले। बाद में वहां पत्थरों को मिलाकर मंदिरों का रूप दिया गया।

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Ashish Gupta

Aug 17, 2016

CG's Madku dweep

Mystry of 11th century found in CG's Madku dweep

शिरीष खरे/रायपुर.
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से बिलासपुर हाइवे पर कोई 80 किलोमीटर दूर है बेतलपुर गांव। यहां से मदकू द्वीप के लिए रास्ता मुड़ता है। लगभग चार किमी का यह सिंगल रोड बारिश में जगह-जगह से उखड़ रहा है। इस पर अधिकतम 20 किमी रफ्तार से ही कार चल सकती है। हम मदकू द्वीप से ठीक पहले शिवनाथ नदी के मुहाने तक पहुंच चुके है। धमतरी के गंगरेल बांध से पानी छोड़े जाने से नदी उफान पर है। नदी पर बना एनीकट का रपटा भी डूबा हुआ है। उस पर चल कर मदकू के टापू पर पहुंचना जान जोखिम में डालने जैसा है। हमारे लिए द्वीप के रहस्यों को जानने की उम्मीद टूटती दिखती है।


इस बीच, उफनती नदी में डोंगी के चलते दिखने से आंखों में थोड़ी चमक आती है। ये डोंगी आसपास के केवटों के मछली पकडऩे में इस्तेमाल होती हैं। डोंगी नदी के किनारे आई तो सरगांव से हमारी यात्रा में जुड़े जोगिन्दर सिंह ने आंधू केवट से बात की। वह थोड़ा ना-नकुर करने के बाद हमें नदी पार कराने को तैयार हो गया। डोंगी में केवट के साथ चार लोग ही बैठ सकते हैं। उफनती नदी को डोंगी से पार करने का यह नया अनुभव है। सभी साथियों के चेहरे पर थोड़ा तनाव साफ दिखता है। लेकिन, मदकू द्वीप तक जाने का उत्साह भी है। खैर, हम डोंगी पर सवार हो गए। कुछ देर में द्वीप के किनारे लगते ही सभी के चेहरे दमक उठे। स्वाभाविक भी है, क्योंकि सभी के चेहरों पर तनाव की जगह उत्साह साफ दिखने लगा।























शिवनाथ नदी के पानी से घिरा मदकू द्वीप आम तौर पर जंगल जैसा ही है। लंबे अरसे से यहां काम कर रहे भगवती प्रसाद मिश्रा बताते हैं, शिवनाथ नदी के बहाव ने मदकू द्वीप को दो हिस्सों में बांट दिया है। एक हिस्सा लगभग 35 एकड़ में है, जो अलग-थलग हो गया है। दूसरा करीब 50 एकड़ का है, जहां 2011 में उत्खनन से पुरावशेष मिले हैं। अब हम इसी द्वीप पर खड़े हैं।

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नदी किनारे से पुरावशेष के मूल अकूत खजाने तक पहुंचने की पगडंडी के दोनों पेड़ों के घने झुरमुट हैं। यहां नदी से बहते पानी की कलकल आती आवाज रोमांचित करती हैं। चलते-चलते जैसे ही पुरातत्व स्थान का द्वार दिखता है, हमारी उत्सुकता भी शिवनाथ नदी की माफिक उफान पर होती है। मुख्य द्वार से अंदर पहुंचते ही दायीं तरफ पहले धूमेश्वर महादेव मंदिर और फिर श्रीराम केवट मंदिर आता है। थोड़ी दूर पर ही श्री राधा कृष्ण, श्री गणेश और श्री हनुमान के प्राचीन मंदिर भी हैं।

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हमारा लक्ष्य 19 मंदिरों के उन समूह को देखने की है, जो 11वीं सदी के कल्चुरी कालीन पुरावैभव की कहानी बयां करते हैं। यहां उत्खनन के साक्षी रहे छत्तीसगढ़ के संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के पर्यवेक्षक प्रभात कुमार सिंह ने एक पुस्तक में वर्णन किया है, इसे मांडूक्य ऋषि की तपो स्थली के रूप में तीन दशक पहले प्रोफेसर डॉ. विष्णु सिंह ठाकुर ने चिन्हित किया था। संभवत: यही पर ऋषि ने 'माण्डूक्योपनिषद्' की रचना की। संविधान में समाहित किए गए 'सत्यमेव जयते' भी इसी महाकृति के प्रथम खंड का छठवां मंत्र है।


वर्ष 1985 से यहां श्री राधा कृष्ण मंदिर परिसर में पुजारी के तौर पर काम कर रहे वीरेंद्र कुमार शुक्ला बताते हैं, पुरा मंदिरों के समूह वाला गर्भगृह पहले समतल था। जब खुदाई हुई तो वहां 19 मंदिरों के भग्नावशेष और कई प्रतिमाएं बाहर आईं। इसमें 6 शिव मंदिर, 11 स्पार्तलिंग और एक-एक मंदिर क्रमश: उमा-महेश्वर और गरुड़ारूढ़ लक्ष्मी-नारायण मंदिर मिले हैं। खुदाई के बाद वहां बिखरे पत्थरों को मिलाकर मंदिरों का रूप दिया गया।























आम तौर पर हर साल यहां आने वाले रामशिखर सवाल करते हैं, पांच साल में इस पुरावैभव के संरक्षण को लेकर अपेक्षित काम नहीं हो पाया। लोहे का डोम बना कर इन मंदिरों को धूप और बरसात से सुरक्षित तो कर लिया गया, लेकिन सदियों पुरानी इस विरासत की पुख्ता सार-संभाल करने वाला कोई नहीं है। क्या आधे-अधूरे साधनों से हम इस धरोहर को बचा पाएंगे।


यह सवाल इसलिए भी अहम हो चुका है, क्योंकि मुंगेली और बलौदाबाजार जिले को यहां मिलाने वाली शिवनाथ नदी के किनारों को रेत माफिया जिस तरह आसपास की जगहों को खोखला कर रहा है, वह इस मदकू द्वीप के लिए बड़ा खतरा बना हुआ है। छत्तीसगढ़ के इस 'मोहनजोदड़ो' खजाने के जमीन में छिपे अनमोल रहस्यों को बाहर लाने के लिए गहन शोध के साथ ही राजकीय संरक्षण भी जरुरी है।

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