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सात तालाबों से घिरा है माता कौशल्या का यह मंदिर, जानें इसके एेतिहासिक महत्व

यह मंदिर दुर्लभतम है, जैसे पुष्कर में ब्रह्मा जी का अकेला प्राचीन मंदिर है, वैसे ही रायपुर के पास कौशल्या जी का अकेला मंदिर स्थित है।

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Ashish Gupta

Jul 09, 2017

Temple of Mata Kaushalya in Chhattisgarh

Temple of Mata Kaushalya in Chhattisgarh

रायपुर.
यह मंदिर दुर्लभतम है, जैसे पुष्कर में ब्रह्मा जी का अकेला प्राचीन मंदिर है, वैसे ही रायपुर के पास कौशल्या जी का अकेला मंदिर स्थित है। प्रदेश की राजधानी रायपुर से तकरीबन 25 किलोमीटर दूर चंदखुरी (प्राचीन नाम चंद्रपुरी) गांव है। करीब 126 तालाब वाले इस गांव में सात तालाबों से घिरे जलसेन तालाब के बीच प्राचीन द्वीप पर एक एेसा मंदिर है, जहां भगवान श्रीराम की माता कौशल्या की प्रतिमा स्थापित है और रामलला उनकी गोद में विराजमान हैं।


यहीं की थीं माता कौशल्या

स्थानीय लोगों की आस्था है कि चंदखुरी ही माता कौशल्या की जन्मस्थली है। मंदिर के पुजारी बताते हैं कि एक ही पत्थर में उभरी माता कौशल्या व भगवान श्रीराम की प्रतिमा गांव के जलसेन तालाब से ही प्राप्त हुई थी, जो आठवीं शताब्दी की है। पुरातत्व विभाग भले ही इसे प्रमाणित नहीं करता है, लेकिन लोगों की आस्था ने इस स्थान को मनोरम और पूजनीय बना दिया है।


दिव्य स्थान, लेकिन प्रचार से वंचित

द्वीप पर स्थित कौशल्या माता का मंदिर हरियाली और मंदिरों से घिरा हुआ है। भगवान शिव और नंदी की विशाला प्रतिमा यहां स्थित है। द्वीप के द्वार पर हनुमान जी विराजमान हैं। दशरथ जी का दरबार यहां लगा है। मन्नत का एक पेड़ भी यहां स्थित है। सुषेण वैद्य की समाधी है।


यहां है कौशल प्रदेश

माता कौशल्या के पिता सुकौशल थे, जिन्हें स्थानीय निवासी भानुमंत राजा के नाम से जानते हैं। छत्तीसगढ़ को पहले कौशल प्रदेश के नाम से जाना जाता था। वहीं माता सुबाला/अमृतप्रभा थीं। रामचरित मानस व वाल्मिकी रामायण में भी कौशल प्रदेश का उल्लेख मिलता है।


यहां श्रीफल बांधकर मांगी जाती है मन्नत

मंदिर परिसर में ही सीताफल का एक पेड़ है, जहां पर्ची में नाम लिखकर उसे श्रीफल के संग बांधा जाता है। कहा जाता है कि एेसा कर मांगी गई मन्नत पूरी होती है। असल में जहां पेड़ है, उस स्थान पर पहले नागराज की बड़ी बाम्बी हुआ करती थी और मान्यता है कि मन्नत नागराज ही पूरी करते हैं।


सुषेण वैद्य ने यहां त्यागे हैं प्राण

कौशल्या मंदिर के पास ही सुषेण वैद की समाधी भी है। सुषेण/सुखैन वैद्य का उल्लेख रामायण में हुआ है। रामायण के अनुसार सुषेण वैद्य लंका के राजा राक्षस-राज रावण का राजवैद्य था। जब रावण के पुत्र मेघनाद के साथ हुए भीषण युद्ध में लक्ष्मण घायल होकर मूर्छित हो गए, तब सुषेण वैद्य ने ही लक्ष्मण की चिकित्सा की थी। उसके यह कहने पर कि मात्र संजीवनी बूटी के प्रयोग से ही लक्ष्मण के प्राण बचाए जा सकते हैं, राम भक्त हनुमान ने वह बूटी लाकर दी और लक्ष्मण को नवजीवन मिला। कहा जाता है कि रावण के अंत के बाद लंका से भगवान राम के साथ सुषेण/सुखैन वैद्य भी आए थे और यहां चंदखुरी में ही उन्होंने प्राण त्यागा था।


चंदे से चल रहा काम

एक ओर जहां कौशल्या माता के इकलौते मंदिर को लेकर लोगों में काफी आस्था है। वहीं, दूसरी ओर इसे धार्मिक या पर्यटन केन्द्र के रूप में विकसित करने की ओर सरकार आंखें मंूदे बैठी है। मंदिर के निर्माण, जीर्णोद्धार से लेकर पूरा संचालन लोगों से मिले दान व चंदे से हो रहा है। शासन-प्रशासन के स्तर पर इस ओर कोई पहल अब तक नहीं की गई, जबकि एक दफा यहां मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की धर्मपत्नी वीणा सिंह भी दर्शन के लिए पहुंची थीं और उस दौरान उन्होंने इस स्थान को विकसित करने के लिए आश्वासन दिया था।

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