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रायपुर रेलवे की व्यवस्था ठप! पार्किंग में एम्बुलेंस के जगह खड़ी हो रही गाड़ियां, घायल यात्री ऐसे पहुंचते है अस्पताल…देखिए

Raipur News: राजधानी के सबसे बड़े स्टेशन के चप्पे-चप्पे का रेलवे प्रशासन ने ऐसा पार्किंग ठेका दिया कि आम यात्री तो दूर की बातें हैं, रेलवे कर्मचारी तक परेशान हैं। स्टेशन के जिस वीआईपी गेट के करीब 24 घंटे संजीवनी 108 एम्बुलेंस के स्टैंड की जगह तय थी, वह जगह रेल कर्मचारियों के वाहनों की पार्किंग बन चुकी है।

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Chhattisgarh News: राजधानी के सबसे बड़े स्टेशन के चप्पे-चप्पे का रेलवे प्रशासन ने ऐसा पार्किंग ठेका दिया कि आम यात्री तो दूर की बातें हैं, रेलवे कर्मचारी तक परेशान हैं। स्टेशन के जिस वीआईपी गेट के करीब 24 घंटे संजीवनी 108 एम्बुलेंस के स्टैंड की जगह तय थी, वह जगह रेल कर्मचारियों के वाहनों की पार्किंग बन चुकी है। क्योंकि बाकी सभी जगह रेलवे ठेकेदार का कब्जा हो चुका है। नो पार्किंग का बोर्ड लगाओ और 100 रुपए जुर्माना वसूलो... इस पैटर्न में रेलवे के जिम्मेदारों को कोई हिचकिचाहट नहीं। न ही यात्रियों के सेहत को लेकर कोई परवाह है।

रेलवे प्रशासन ने खुद तय किया था कि अचानक किसी यात्री की तबीयत बिगड़ने पर संजीवनी 108 एम्बुलेंस काफी मददगार होगी। इसलिए यात्रियों को यह सुविधा मुहैया कराने के उद्देश्य से इस एम्बुलेंस का संचालन रेलवे परिसर से होगा। शहर के किसी हिस्से में कोई घटना, दुर्घटना होने की स्थिति में भले ही यह 108 एम्बुलेंस इमरजेंसी सेवा में जाएगी, परंतु उसका स्थायी स्टैंड स्टेशन परिसर होगा। क्योंकि संजीवनी 108 एम्बुलेंस भी भारत सरकार की योजना का हिस्सा है और रेलवे विभाग भी। इसलिए कोई दिक्कत नहीं। यह निर्णय भी लिया गया था, जब स्टेशन के प्लेटफार्म पर ट्रेन रुकते ही हार्ट अटैक से एक यात्री की सांसें धक-धक करने लगी थी। उस दौरान न तो रेलवे स्टेशन से 5 किलोमीटर दूर डब्ल्यूआरएस रेलवे अस्पताल के डॉक्टर काम आए थे न ही वह एम्बुलेंस जो अस्पताल परिसर में रहती है।

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40 से 50 हजार यात्रियों की रोज आवाजाही

रेलवे मंडल का रायपुर स्टेशन सबसे बड़ा है। जिसे रेलवे बोर्ड ने ए 1 श्रेणी का दर्जा दिया हुआ है, लेकिन अचानक किसी यात्री की तबीयत प्लेटफार्म एक से लेकर 7 तक बिगड़ जाए तो फिर उस यात्री का भगवान ही मालिक है। तत्काल अस्पताल पहुंचाने की कोई सुविधा नहीं है। जबकि रोजाना 40 से 50 हजार यात्रियों की आवाजाही इस स्टेशन से होती है। फिर भी ऐसी घोर लापरवाही कि जिस संजीवनी 108 एम्बुलेंस का संचालन स्टेशन परिसर से हुआ करता था, उसका कहीं अता-पता नहीं है। ऐसे में इमरजेंसी जैसे हालात में एक मात्र सहारा ऑटो रिक्शा है।

गोली चलने से घायल जवान का जिंदगी से संघर्ष

अभी हाल ही में सुबह-सुबह सारनाथ एक्सप्रेस के प्लेटफार्म एक पर रुकते ही एक जवान के हाथ से अचानक गोली चलने से उसकी जान नहीं बची। वहीं गोली से घायल यात्री निजी अस्पताल में ठीक होने के लिए संघर्ष कर रहा है, जो अपने पिता के हार्ट का इलाज कराने घर से निकला था। इस घटना में भी अस्पताल तक ले जाने रेलवे की एम्बुलेंस काम नहीं आई। बल्कि जीवन-मौत से संघर्ष कर रहे जवान और यात्री को ऑटो रिक्शा से 15 किमी दूर निजी अस्पताल ले जाना पड़ा। यदि उस दौरान संजीवनी 108 स्टेशन परिसर में खड़ी रहती तो ऐसी नौबत नहीं आती।

स्टेशन में संजीवन 108 एम्बुलेंस बड़ी सुविधाजनक थी। 7 से 8 महीने पहले तक परिसर के तय स्टैंड में रहती थी, इसके बाद से उसका कोई पता नहीं है। इमरजेंसी के लिए स्टेशन परिसर से संचालन जरूरी है। इसके लिए प्रयास किया जाएगा। - सीएस महापात्रा, स्टेशन डायरेक्टर, रायपुर

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