
आरएमए की प्राइवेट प्रैक्टिस पर प्रतिबंध, मगर मेडिकल ऑफिसर के अधीन देंगे सेवाएं,आरएमए की प्राइवेट प्रैक्टिस पर प्रतिबंध, मगर मेडिकल ऑफिसर के अधीन देंगे सेवाएं
रायपुर. ग्रामीण चिकित्सा सहायक (आरएमए) पाठ्यक्रम, पद और इनकी नियुक्तियों को लेकर बिलासपुर हाईकोर्ट में लगी तीन याचिकाओं पर 19 सालों से जारी सुनवाई पर कोर्ट ने फैसला सुना दिया है। कोर्ट ने पाठ्यक्रम को सही माना है, मगर यह आरएमए की प्राइवेट प्रैक्टिस पर प्रतिबंध लगा दिया है। साथ ही, अपने फैसले में यह भी साफ-साफ लिखा है कि ये मेडिकल ऑफिसर के अधीन सेवाएं देंगे।
इस फैसले ने आरएमए की पढ़ाई करने वाले 1300 डिग्रीधारी छात्रों को लाइफ-लाइन दे दी है। इनमें से 730 स्वास्थ्य विभाग में नियमित पदों पर सेवाएं दे रहे हैं, तो वहीं 600 डिग्रीधारी राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत कार्यरत हैं। वर्ष 2001 में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आईएमए) की छत्तीसगढ़ इकाई द्वारा आरएमए के पद को हाईकोर्ट में चैलेंज किया था। इसके बाद नर्सिंग एसोसिएशन, डॉक्टर एसोसिएशन, नेत्र सहायकों के संगठन ने भी याचिका दायर की थी। जिस पर राज्य सरकार ने कोर्ट के समक्ष मत रखा। राज्य सरकार के एडिशनल एडवोकेट जनरल ने कहा कि 'आरएमए क्वालिफाइड डॉक्टरों और अंतिम व्यक्ति के बीच की कड़ी है। यह फस्र्ट एड प्रोवाइडर की भूमिका निभाएंगे।Ó कोर्ट ने माना कि ग्रामीण अंचलों में स्वास्थ्य सुविधाएं को प्रदान किए जाने के लिए शासन का यह कदम जरूरी था।
आरएमए वाली खबर में जोड़-आईएमए ने दिया था- डॉक्टरों के अधिकारों के हनन का हवालाआईएमए ने हाईकोर्ट में दायर याचिका में इस बात का उल्लेख किया था कि आरएमए चिकित्सा के क्षेत्र में सेवाएं देंगे तो यह मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (एमसीआई) के नियमों का उल्लंघन है। एमबीबीएस की साढ़े चार साल की पढ़ाई करने, इसके बाद एक साल की इंटरर्नशिप करने वाले डॉक्टरों के अधिकारों का भी हनन है। इसलिए इसे मान्य न किया जाए। कोर्ट ने इसे जनता को चिकित्सकीय सेवाएं प्रदान करने वाला कदम बताया। कहा कि अब पाठ्यक्रम बंद हो चुका है, तो इसके मान्य करने न करने का सवाल ही नहीं उठता।
सरकार की नई आरएमए नीति, नहीं लिख सकेंगे डॉक्टर- हाईकोर्ट ने लगी तीनों याचिकों का पर सुनाया फैसला, किया निपटारारायपुर.राज्य सरकार ने ग्रामीण चिकित्सा सहायकों (आरएमए) के लिए नई नीति का निर्धारण कर दिया है। जिसके तहत ये डॉक्टर तो लिख नहीं सकते साथ ही इन्हें सिर्फ और सिर्फ प्राथमिक उपचार की पात्रता होगी। सरकार ने नई नीति लागू कर दी है, जो हाईकोर्ट के समक्ष भी रखी गई। कोर्ट ने इसे उचित माना है।
पूर्व मुख्यमंत्री जोगी के कार्यकाल में हुआ था पाठ्यक्रम शुरू-
पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के कार्यकाल में यह पाठ्यक्रम शुरू हुआ था,ताकि डॉक्टरों की कमी को पूरा किया जा सके। ग्रामीण अंचलों में मरीजों को इलाज मिल सके। यह पाठ्यक्रम तीन सालों तक चला व बाद में इस बंद कर दिया गया। इसलिए कोर्ट ने कहा है कि जब पाठ्यक्रम ही बंद हो गया है तो इसे अब अमान्य करने की जरुरत नहीं।
सरकार की नई नीति इस प्रकार-
1- आरएमए मेडिकल ऑफीसर या खंड चिकित्सा अधिकारी के सुपर विजन में असिस्टेंट के रूप में कार्य करेंगे।
2- पीएचसी या हेल्थ एंड वैलनेस सेंटर में सभी राष्ट्रीय कार्यक्रमों को मेडिकल ऑफिसर या खंड चिकित्सा अधिकारी के सुपरविजन में संपादित करेंगे।
3- आरएमए को स्वतंत्र प्रैक्टिस पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा तथा स्वतंत्र प्रैक्टिस करते हुए पाए जाने पर कार्यवाही की जाएगी?
4- आरएमए अपने नाम के आगे डॉक्टर नहीं लिख सकेंगे।
5- मरीज को फस्र्ट एड देकर हायर सेंटर रेफर करेंगे।
6- आरएमए टेली कंसल्टेशन तथा टेलीमेडिसिन के माध्यम से भी मेडिकल ऑफिसर के सुपरविजन में रहेंगे।
7- आरएमए पद मेडिकल ऑफिसर पद के नीचे तथा फार्मासिस्ट, लैब टेक्नीशियन ,स्टाफ नर्स ,आदि के ऊपर रहेगा।
8- आरएमए सभी राष्ट्रीय कार्यक्रमों को मेडिकल ऑफिसर तथा खंड चिकित्सा अधिकारी के सुपरविजन में संचालित करेंगे।
मेरा यह कहना है कि आरएमए को लेकर हाईकोर्ट ने जो भी दिशा-निर्देश दिए हैं, उनका सरकार को पालन करवाना चाहिए। आरएमए को डॉक्टर लिखने जैसी गलतियां न हों।
डॉ. महेश सिन्हा, अध्यक्ष, आईएमए, एक्शन कमेटी छत्तीसगढ़
हाईकोर्ट ने विभाग की तरफ से जो तथ्य रखे गए, उन्हें उचित माना। कोर्ट ने अपने फैसले में जो लिखा है, उसका अक्षरस: पालन होगा। आरएमए डॉक्टरों के अधीनस्त सेवाएं देंगे।
नीरज बंसोड़, संचालक, स्वास्थ्य सेवाएं
Published on:
07 Feb 2020 12:18 pm
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