
इस ड्रोन मास्टर को 15, 20 और 25 लीटर क्षमता वाले द्रोण से सीएम हाउस समेत शहर के कई हिस्सों की ऊंची बिल्डिंग को सेनेटाइज किया गया है। पेस्टीसाइड स्प्रे के कॉन्सेप्ट से आया था सेनेटाइजर ड्रोन बनाने का आइडिया
ताबीर हुसैन @ रायपुर। कोरोना से बचाव के लिए तमाम कोशिशें की जा रही हैं। इसमें सबसे जरूरी कदम है सेनेटाइजेशन। कहीं सेनिटाइज टनल लगाए जा रहे हैं तो कहीं ऑटोमेटिक मशीन। इन दिनों राजधानी की इमारतों को भी सेनेटाइज किया जा रहा है। जिसके लिए द्रोण का सहारा लिया गया है। आखिर किसने बनाया है यह द्रोण? इस काम को अंजाम दिया है सिटी के एनॉर्टिकल इंजीनियर पराग झा ने। वे मूलत: अंबिकापुर के हैं लेकिन ग्रेजुएशन रायपुर से किया है। इसके बाद वे बैंगलुरू से यूएवी डिजाइनिंग में डिप्लोमा किया। खास बात ये कि इसके लिए उन्होंने कोई चार्ज भी नहीं लिया। वे कहते हैं कि कोरोना के जंग में शामिल होना ही अपने आप में बड़ी उपलब्धि है। 15, 20 और 25 लीटर क्षमता वाले द्रोण से सीएम हाउस समेत शहर के कई हिस्सों की ऊंची बिल्डिंग को सेनेटाइज किया गया है।
चेन्नई के दोस्त से ली मदद
ये कोई नई चीज नहीं है। खेतों में पेस्टीसाइड का खात्मा करने ड्रोन का इस्तेमाल किया जाता रहा है। बस उसी कॉन्सेप्ट को यहां आजमाया गया है। ये जरूर है कि इस काम को महज 4 दिन में पूरा किया गया। इसमें मेरी टीम के अलावा चेन्नई के दोस्त अग्निवेश का योगदान रहा। लॉकडाउन के चलते कुछ जरूरी पाट्र्स मिल नहीं रहे थे तो मैंने उसे एप्रोच किया था। नारायणपुर एसपी मोहित गर्ग का भी सहयोग रहा, वहां से ड्रोन कलेक्ट किए गए। मैं नगर निगम के कमिश्नर सौरभ कुमार को थैंक्स कहूंगा जिन्होंने मुझे यह अपॉर्चुनिटी दी।
नक्सल बेल्ट के बच्चों को भी सिखाया
उनके बनाए ड्रोन नक्सल ऑपरेशन, सीआरपीएफ और बीएसएफ में यूज किए जा रहे हैं। 45 हजार रुपए लोन से खोली गई कंपनी का टर्वओवर 4 साल में 5 करोड़ रुपए हो चुका है। पराग की कंपनी में 9 लोग हैं जो सेलरी बेस्ड हैं। वहीं 45 छात्रों को रोजगार दिया है। पराग ने बताया कि बैंगलुरु में ड्रोन की ट्रेनिंग लेते वक्त मैंने वहां पूछा था कि छत्तीसगढ़ में ऐसा बना सकते हैं क्या? जवाब मिला था कि वह काफी पिछड़ा इलाका है। वहां कोई स्कोप नहीं है। लेकिन मैंने नक्सल बेल्ट में भी बच्चों को ड्रोन बनाना सिखा दिया है।
16 हजार से 16 लाख तक के ड्रोन
पराग ने बताया कि कम से कम कीमत के ड्रोन 16 हजार रुपए में बनाए जा सकते हैं और अधिक से अधिक 16 लाख तक। 16 हजार के ड्रोन छात्रों के लिए है। या उनके लिए जो मैरिज पार्टी वगैरह रेकॉर्ड करना चाहें। वहीं 16 लाख के ड्रोन का यूज अंधेरे में नक्सलियों की मॉनिटरिंग में किया जाता है।
नक्सल बेल्ट के बच्चों को भी सिखाया
उनके बनाए ड्रोन नक्सल ऑपरेशन, सीआरपीएफ और बीएसएफ में यूज किए जा रहे हैं। ४५ हजार रुपए लोन से खोली गई कंपनी का टर्वओवर ४ साल में ५ करोड़ रुपए हो चुका है। पराग की कंपनी में ९ लोग हैं जो सेलरी बेस्ड हैं। वहीं ४५ छात्रों को रोजगार दिया है। पराग ने बताया कि बैंगलुरु में ड्रोन की ट्रेनिंग लेते वक्त मैंने वहां पूछा था कि छत्तीसगढ़ में एेसा बना सकते हैं क्या? जवाब मिला था कि वह काफी पिछड़ा इलाका है। वहां कोई स्कोप नहीं है। लेकिन मैंने नक्सल बेल्ट में भी बच्चों को ड्रोन बनाना सिखा दिया है।
१६ हजार से १६ लाख तक के ड्रोन
पराग ने बताया कि कम से कम कीमत के ड्रोन १६ हजार रुपए में बनाए जा सकते हैं और अधिक से अधिक १६ लाख तक। १६ हजार के ड्रोन छात्रों के लिए है। या उनके लिए जो मैरिज पार्टी वगैरह रेकॉर्ड करना चाहें। वहीं १६ लाख के ड्रोन का यूज अंधेरे में नक्सलियों की मॉनिटरिंग में किया जाता है।
Published on:
09 May 2020 04:52 pm
बड़ी खबरें
View Allरायपुर
छत्तीसगढ़
ट्रेंडिंग
