
वर्षों से चली आ रही सनातन परंपरा है पंचकोशीधाम यात्रा : सिद्धेश्वरानंद
नवापारा-राजिम। पटेश्वरनाथ भगवान का धाम ग्राम पटेवा में मड़ई 11 जनवरी के बाद 12 जनवरी से पंचकोशीधाम यात्रा का भी शुभारंभ हुआ। पटेश्वरनाथ, चंपेश्वरनाथ, बम्हनेश्वरनाथ, कोपेश्वरनाथ व कुलेश्वरनाथ भगवान धाम की पैदल यात्रा की जाएगी। इस पंचकोशी धाम यात्रा के नेतत्वकर्ता आचार्य सिद्धेश्वरानंद महाराज ने बताया कि पंचकोशी धाम यात्रा वर्षों से चली आ रही एक सनातन परंपरा है। इस परंपरा में हजारों की संख्या में श्रद्घालु भक्तगण त्रिवेणी संगम राजिम में प्रतिवर्ष 11 जनवरी को श्री कुलेश्वरनाथ मंदिर में उपस्थित होते हैं और 12 जनवरी को वहां से सर्वप्रथम दर्शन के लिए पटेश्वरनाथ भगवान की भूमि पटेवा पहुंचते हैं। जहां दिनभर विराम के बाद पुन: दूसरे धाम की यात्रा के लिए चंपेश्वनाथ की भूमि चंपारण पहुंचते हैं। वहां से फिर बम्हनेश्वरर महादेव, कोपेश्वर महादेव और अंतिम श्रीकुलेश्वरनाथ व भगवान श्री राजीव लोचन की पूजा-अर्चना कर इस पंचकोशी धाम यात्रा का समापन करते हैं। यह पंचकोशी धाम यात्रा सप्ताह भर चलता है। जिसमें बड़ी संख्या में प्रदेशभर व अंचल से महिला व पुरुष शामिल होते हैं।
विदित हो कि पंचकोशी यात्रा बद्रीनाथ-केदारनाथ चारधाम यात्रा की तरह छत्तीसगढ़ में भी पंचकोशी यात्रा निकाली जाती है. इसमें प्रदेश के कोने-कोने से हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं. मान्यता है कि जो लोग किसी कारणवश बद्रीनाथ-केदारनाथ की चारधाम यात्रा पर नहीं जा सकते वो लोग इस यात्रा में शामिल हो सकते हैं. इस यात्रा से भी उतना ही फल प्राप्त होता है. पांच दिन तक चलने वाली इस पंचकोशी पदयात्रा में श्रद्धालु 25 कोश पैदल चलकर 5 पड़ाव में 5 शिवलिंगों की दर्शन करते हैं.
पंचकोशी धाम की यात्रा कठिन तपस्या
पंचकोशी धाम यात्रा एक कठिन तपस्या ही है। जिसमें पंचकोशी यात्रा पर निकले श्रद्घालु भक्तजन अलग-अलग नियमों का पालन करते हैं। पदयात्रियों ने बताया कि यह यात्रा सप्ताह भर चलती है। जिसमें हम सभी नंगे पांव पैदल यात्रा करते हैं। एक ही कपड़े में बिना साबुन आदि के प्रयोग के सप्ताहभर उसी वस्त्र को धारण करना रहता है।श्रध्दालु क्तगण को एक ही समय भोजन ग्रहण करना रहता है। बाहर का खाना प्रतिबंधित होता है। अलसुबह कोसों दूर चलकर एक-एक धाम पहुंचना पड़ता है और दिन भर उस धाम पर रुककर वहां भक्ति भजन करते हुए व्यतीत करना पड़ता है। वहीं, इस पंचकोशी धाम की यात्रा से वर्षों से सोए भाग्य का उदय होता है, ऐसी मान्यता है। यही कारण है कि बड़ी संख्या में लोग इस पंचकोशीधाम यात्रा का हिस्सा बनते हैं।
यात्रा का प्रारंभ हुआ पटेवा से
पंचकोशी यात्रा के प्रारंभ स्थल व मड़ई होने के चलते ग्राम पटेवा में बड़ी संख्या में गांव सहित अंचल के श्रद्घालु भक्तजन यहां दर्शन के लिए पहुंचे। पंचकोशीधाम यात्रा से जुड़े आचार्य सिद्धेश्वरानंद महाराज ने बताया कि प्रतिवर्ष इस यात्रा में तीन हजार के श्रद्घालु जुटते थे जो कि 2021में कोरोना के चलते घटकर बहुत ही कम हो गई थी, इस वर्ष संख्या अच्छी है।
यहां पंचकोसी यात्रा क्यों की जाती है
इस पर सिद्धेश्वर महाराज ने बताया कि एक बार विष्णु ने विश्वकर्मा से कहा कि धरती पर वे एक ऐसी जगह उनके मंदिर का निर्माण करें, जहां पांच कोस के अंदर शव न जला हो। अब विश्वकर्माजी धरती पर आए, और ढूंढ़ते रहे, पर ऐसा कोई स्थान उन्हें दिखाई नहीं दिया। उन्होंने वापस जाकर जब विष्णुजी से कहा तब विष्णुजी एक कमल के फूल को धरती पर छोडक़र विश्वकर्माजी से कहा कि यह जहां गिरेगा, वहीं हमारे मंदिर का निर्माण होगा। इस प्रकार कमल फूल के पराग पर विष्णु भगवान का मन्दिर है और पंखुडिय़ों पर पंचकोसीधाम बसा हुआ है। कुलेश्वर नाथ (राजिम), चम्पेश्वर नाथ (चम्पारण्य), ब्राह्मकेश्वर (ब्रह्मणी), पाणेश्वरनाथ (फिंगेश्वर) कोपेश्वर नाथ (कोपरा)। यपंचकोशीधाम यात्रा शुरू, सप्ताहभर तक की जाएगी पैदल यात्रा
वर्षों से चली आ रही सनातन परंपरा है पंचकोशीधाम यात्रा : सिद्धेश्वरानंद
नवापारा-राजिम। पटेश्वरनाथ भगवान का धाम ग्राम पटेवा में मड़ई 11 जनवरी के बाद 12 जनवरी से पंचकोशीधाम यात्रा का भी शुभारंभ हुआ। पटेश्वरनाथ, चंपेश्वरनाथ, बम्हनेश्वरनाथ, कोपेश्वरनाथ व कुलेश्वरनाथ भगवान धाम की पैदल यात्रा की जाएगी। इस पंचकोशी धाम यात्रा के नेतत्वकर्ता आचार्य सिद्धेश्वरानंद महाराज ने बताया कि पंचकोशी धाम यात्रा वर्षों से चली आ रही एक सनातन परंपरा है। इस परंपरा में हजारों की संख्या में श्रद्घालु भक्तगण त्रिवेणी संगम राजिम में प्रतिवर्ष 11 जनवरी को श्री कुलेश्वरनाथ मंदिर में उपस्थित होते हैं और 12 जनवरी को वहां से सर्वप्रथम दर्शन के लिए पटेश्वरनाथ भगवान की भूमि पटेवा पहुंचते हैं। जहां दिनभर विराम के बाद पुन: दूसरे धाम की यात्रा के लिए चंपेश्वनाथ की भूमि चंपारण पहुंचते हैं। वहां से फिर बम्हनेश्वरर महादेव, कोपेश्वर महादेव और अंतिम श्रीकुलेश्वरनाथ व भगवान श्री राजीव लोचन की पूजा-अर्चना कर इस पंचकोशी धाम यात्रा का समापन करते हैं। यह पंचकोशी धाम यात्रा सप्ताह भर चलता है। जिसमें बड़ी संख्या में प्रदेशभर व अंचल से महिला व पुरुष शामिल होते हैं।
विदित हो कि पंचकोशी यात्रा बद्रीनाथ-केदारनाथ चारधाम यात्रा की तरह छत्तीसगढ़ में भी पंचकोशी यात्रा निकाली जाती है. इसमें प्रदेश के कोने-कोने से हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं. मान्यता है कि जो लोग किसी कारणवश बद्रीनाथ-केदारनाथ की चारधाम यात्रा पर नहीं जा सकते वो लोग इस यात्रा में शामिल हो सकते हैं. इस यात्रा से भी उतना ही फल प्राप्त होता है. पांच दिन तक चलने वाली इस पंचकोशी पदयात्रा में श्रद्धालु 25 कोश पैदल चलकर 5 पड़ाव में 5 शिवलिंगों की दर्शन करते हैं.
पंचकोशी धाम की यात्रा कठिन तपस्या
पंचकोशी धाम यात्रा एक कठिन तपस्या ही है। जिसमें पंचकोशी यात्रा पर निकले श्रद्घालु भक्तजन अलग-अलग नियमों का पालन करते हैं। पदयात्रियों ने बताया कि यह यात्रा सप्ताह भर चलती है। जिसमें हम सभी नंगे पांव पैदल यात्रा करते हैं। एक ही कपड़े में बिना साबुन आदि के प्रयोग के सप्ताहभर उसी वस्त्र को धारण करना रहता है।श्रध्दालु क्तगण को एक ही समय भोजन ग्रहण करना रहता है। बाहर का खाना प्रतिबंधित होता है। अलसुबह कोसों दूर चलकर एक-एक धाम पहुंचना पड़ता है और दिन भर उस धाम पर रुककर वहां भक्ति भजन करते हुए व्यतीत करना पड़ता है। वहीं, इस पंचकोशी धाम की यात्रा से वर्षों से सोए भाग्य का उदय होता है, ऐसी मान्यता है। यही कारण है कि बड़ी संख्या में लोग इस पंचकोशीधाम यात्रा का हिस्सा बनते हैं।
यात्रा का प्रारंभ हुआ पटेवा से
पंचकोशी यात्रा के प्रारंभ स्थल व मड़ई होने के चलते ग्राम पटेवा में बड़ी संख्या में गांव सहित अंचल के श्रद्घालु भक्तजन यहां दर्शन के लिए पहुंचे। पंचकोशीधाम यात्रा से जुड़े आचार्य सिद्धेश्वरानंद महाराज ने बताया कि प्रतिवर्ष इस यात्रा में तीन हजार के श्रद्घालु जुटते थे जो कि 2021में कोरोना के चलते घटकर बहुत ही कम हो गई थी, इस वर्ष संख्या अच्छी है।
यहां पंचकोसी यात्रा क्यों की जाती है
इस पर सिद्धेश्वर महाराज ने बताया कि एक बार विष्णु ने विश्वकर्मा से कहा कि धरती पर वे एक ऐसी जगह उनके मंदिर का निर्माण करें, जहां पांच कोस के अंदर शव न जला हो। अब विश्वकर्माजी धरती पर आए, और ढूंढ़ते रहे, पर ऐसा कोई स्थान उन्हें दिखाई नहीं दिया। उन्होंने वापस जाकर जब विष्णुजी से कहा तब विष्णुजी एक कमल के फूल को धरती पर छोडक़र विश्वकर्माजी से कहा कि यह जहां गिरेगा, वहीं हमारे मंदिर का निर्माण होगा। इस प्रकार कमल फूल के पराग पर विष्णु भगवान का मन्दिर है और पंखुडिय़ों पर पंचकोसीधाम बसा हुआ है। कुलेश्वर नाथ (राजिम), चम्पेश्वर नाथ (चम्पारण्य), ब्राह्मकेश्वर (ब्रह्मणी), पाणेश्वरनाथ (फिंगेश्वर) कोपेश्वर नाथ (कोपरा)। यात्राकाल में हर शिव नगरी में यात्री एक-एक रात्रि विश्राम करते हैं। रात के वक्त सभी मिलकर भजन, कीर्तन और जप करते हैं।
Published on:
13 Jan 2023 04:25 pm
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