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स्लोगन बना ‘चाय-समोसा कच्चा वोट, दारू-मुर्गा पक्का वोटÓ, रोज चल रही पार्टी

खरोरा. जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते हैं खबरें आनी शुरू हो जाती है कि चुनाव का डंका बजते ही वार्ड में बैठकों का दौर और शराबियों का शोर बढ़ गया है। आलम यह है कि गलियों में दिन में भी पियक्कड़ों की संख्या बढ़ गई

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स्लोगन बना 'चाय-समोसा कच्चा वोट, दारू-मुर्गा पक्का वोटÓ, रोज चल रही पार्टी

स्लोगन बना 'चाय-समोसा कच्चा वोट, दारू-मुर्गा पक्का वोटÓ, रोज चल रही पार्टी

खरोरा. जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आते हैं खबरें आनी शुरू हो जाती है कि चुनाव का डंका बजते ही वार्ड में बैठकों का दौर और शराबियों का शोर बढ़ गया है। आलम यह है कि गलियों में दिन में भी पियक्कड़ों की संख्या बढ़ गई है। मुफ्त की शराब गटकने वाले नगर का के शराबी के लिए चुनाव एक त्यौहार से कम नही हैं। कई मतदाता इन दिनों जमकर शराब की पार्टियां उड़ा रहे हैं। ऐसे वोटर आज यहां तो कल दूसरे प्रत्याशी के खेमे में शराब के पैग लगाते आसानी से देखे जा सकते हैं। शराबी मतदाताओं को समझने में प्रत्याशियों के भी पसीने छूट जाते हैं।
पल-पल नए रंग बदलने वाले पियक्कड़ वोटर को भी मात देना प्रत्याशियों के लिए आसान नही है। इनके आगे चुनावी पंडित की भविष्यवाणी भी फेल है। चुनाव आते ही घरेलू महिलाओं का टेंशन बढ़ जाता है। परिवार के शराबी सदस्यों को संभालना उनके लिए चुनौती से कम नहीं है। जो शराबी कभी कभार देशी दारू से काम चलाते थे, वह इन दिनों महंगी अंग्रेजी शराब से कम की बात भी नहीं करते।
पूछने पर एक ही जवाब होता है कि पांच साल में एक बार तो यह सुहावने दिन आते हैं। ऐसे लोगों को नगर के विकास से कोई मतलब नहीं होता है, यही कारण है कि आज भी हमारे नगर विकास की दौड़ में पिछड़े हुए हैं। कह सकते हैं कि नेता और प्रजा दोनों ही एक दूसरे की साइकोलॉजी समझते हैं। नेता जानते हैं कि वोट पिलाने खिलाने और खर्चा करने से ही मिलते हैं।
सामान्य मतदाता की यही समझ है कि नेता पांच सालों में सिर्फ एक बार उसके दरवाजे पर आता है। मतदाता भी समझता है कि अभी पूंछ दबी है तो जो भी उसकी मांग होगी, पूरी की जाएगी। तो मतदाता भी अपनी पूरी समझ और क्षमता से पांच सालों की कसर एक बार में ही निकालना चाहता है।
चुनावों के मौसम में नगरों की लोकल बस्तियों में भी ऐसे तमाम बिचौलिए सक्रिय हो जाते हैं जो प्रत्याशियों से मोटी रकम लेकर उन्हें अपने क्षेत्र के मतदाताओं का एकमुश्त वोट दिलाने का वादा
करते हैं। मजे की बात तो ये है कि ये बिचौलिए अपने क्षेत्र के प्राय: सभी दलों के प्रत्याशियों से वोट के नाम पर उगाही करते हैं। जनता भी इस सच्चाई को जानती है। आज कल चौक-चौराहों में पान और चाय की दुकानों पर लोगों को 'चाय समोसा कच्चा वोट, मुर्गा दारू पक्का वोटÓ, जैसी बातें बोलकर ठहाका मारते देखे जा रहे हैं।
बहकावे व प्रलोभन में न आएं मतदाता
असल में ये पैसा कहां खर्च होगा। सच्चाई तो ये है कि चुनावों को दारू-मुर्गा का उत्सव और कमाई का मौका समझने वाले लोग उन प्रत्याशियों जितना ही गलत समझे, जो इन चीजों की आपूर्ति कर के चुनाव जीतना चाहते हैं। पर गलत वो लोग भी है जो इन गतिविधियों में शामिल न हों, पर इन्हें मूक सहमति देते हैं। चुनावों में होने वाली इस फिजूलखर्ची और गलत तरीकों से जहां एक तरफ सत्ता गलत हाथों में चली जाती है, वहीं तमाम योग्य और नेतृत्व में सक्षम लोग चुनाव के भारी-भरकम खर्च को देखकर हतोत्साहित हो जाते हैं।

नए नशेड़ी हो रहे तैयार
प्रत्याशियों की ओर से मुफ्त में मिलने वाली शराब आगामी पीढिय़ों को नशे की तरफ धकेल रही है। चुनाव में अनेक युवा पहली बार शराब का सेवन कर इसके हमेशा के लिए आदी हो जाते हैं। शुरुआत में फ्री की शराब से ही ऐसे नशेडिय़ों की फौज दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। नगर का भला चाहने वाला प्रत्याशी किसी भी कीमत पर शराब के दम पर जीत हासिल करने का प्रयत्न नहीं करेगा। शराब वहीं बांटते हैं जिन्हें नगर के विकास से कोई लेना-देना नहीं होता है। ऐसे लोगों को बस जीतने से मतलब होता है। नशे के कारण बर्बाद होने वाले परिवारों से उन्हें कोई सरोकार नहीं होता है।

वोट की कीमत समझने की जरूरत
ये बात दरअसल उतनी सीधी है नहीं जितनी लग रही है। सोचकर देखिये, अगर किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रत्याशी टिकट से लेकर वोट तक सब कुछ पैसे देकर ही पाएंगे, तो चुनाव जीतकर पद पा जाने के बाद उनकी मूल प्राथमिकता अपने इन्वेस्टमेंट की भरपाई होगी या नगर सेवा, ये समझना कोई बड़ी बात नहीं है। दुख की बात तो ये है कि प्रत्याशियों द्वारा वोट के बदले नोट कल्चर को समाज के लगभग सभी हिस्सों से मूक सहमति मिली हुई है। तमाम लोग अपने वोट के महत्व को समझने की बजाए उसके दाम को भुनाने में ज्यादा फायदा समझते हैं।

लोगों ने क्या कहा
मतदाता किस मुह से नेता के गलत कहें समझने की बात है कि अधिकांश राजनीतिक दल के प्रत्याशी और मतदाता सभी खाने-खिलाने की राजनीति में भरोसा रखने वाले हैं, तो किसी मतदाता को कोई अधिकार नहीं है कि वो किसी नेता को गलत कहे।
राहुल यादव, युवा मतदाता
अच्छा नेता नहीं चुन सकते, यह सही के चुनाव के दौरान मुर्गा दारू पार्टी चलती हैं, पर यह सब करके अच्छा नेता चुनाव करना संभव नही हैं। हर मतदाता एक सा नही होता पर प्रलोभन की राजनीति चली आ रही हैं।
कुशकुमार शर्मा, युवा मतदाता
मतदाता स्वविवेक से निर्णय ले,यह सौ फीसदी सही है कि दारू-मुर्गा पक्का वोट। चुनाव आते नये-नये शराबी पैदा होते हैं। चुनाव पर यह सब परोसना सही नही, मतदाता अपने स्वविवेक से निर्णय ले। क्योंकि चुनाव नशे को बढ़ावा नही देता। आपको यह उपभोग नही करना हैं, तो कोई जबरदस्ती नही कर सकता।
अवधेश यादव

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