
सुमित यादव @ रिपोर्टर रायपुर . मेरे घर आंगन में भैया, फुदक रही देखो गौरैया, चूं चूं करती, चीं चीं करती, नहीं किसी से भी यह डरती... ये कहावत अब गौरैया पर बिल्कुल भी फिट नहीं बैठेगी। एक समय था कि सुबह होते ही घर के आंगन में गौरैया अपना बसेरा बना लेती थी। लेकिन आज देखने को नहीं मिलती है। एक दशक पहले तक सबसे ज्यादा नजर आने वाले पक्षियों में शामिल रही गौरैया अब मुश्किल से नजर आती है। घरेलू पक्षी गौरैया का मुख्य ठिकाना शहरी क्षेत्र ही हुआ करते हैं। गौरैया के लुप्त होने के सबसे बड़ी वजह पर्यावास है।
पर्यावरण संरक्षक दीपेंद्र दीवान कहते है, शहर की में पिछले कई सालों से लगातार इमारतों का बनना और डवलपमेंट के काम भी बहुत तेजी के साथ हो रहा है। जिसके चलते गौरैया को इमारतों में अपना छोटा सा घरौंदा बनाने के लिए जगह नहीं मिल पा रही है।
गौरैया को भोजन में अनाज के दाने और कीट चाहिए। इन दिनों कीटनाशकों के ज्यादा इस्तेमाल से उनको पर्याप्त भोजन नहीं मिल पाता है। ये तो साधारण तिनकों से घोंसले बनाती है। इसके लिए घरों के रोशनदान में भी नहीं बचे।
भोजन नहीं मिलने से इनकी ब्रीडिंग भी प्रभावित होने लगी है। पेड़ों की कटाई पर हो रोक दीवान बताते हैं कि शहरों में विकास के नाम पर हो रही निरंतर पेड़ों की कटाई, शहरी क्षेत्र में पक्के घरो का निर्माण, तेजी से बढ़ते पर्यावरण प्रदूषण के चलते अब मनुष्य की सबसे करीबी चिडिय़ा गोरैया धीरे धीरे कम हो रही है इसकी संख्या में आती कमी के कारण इसे संरक्षण देने और हमारे आसपास इसे बचाने के कुछ सार्थक प्रयास करने की जरूरत है जिससे ये पक्षी हमारे पास निरंतर चहकती रहे।
पंक्षी वैज्ञानिक अरुण एमके भरोस बताते हैं कि घरों के अहाते और पिछवाड़े में विदेशी नस्ल के पौधों के बजाए देशी फलदार पौधे लगाकर इन चिडिय़ों को आहार और घरौदें बनाने का मौका दे सकते हैं। साथ ही जहरीले कीटनाशक के इस्तेमाल को रोककर, इन वनस्पतियों पर लगने वाले परजीवी कीड़ों को पनपने का मौका देकर इन चिडिय़ों के चूजों के आहार की भी उपलब्धता करवा सकते है, क्यों कि गौरैया जैसे परिन्दों के चूजें कठोर अनाज को नही खा सकते, उन्हें मुलायम कीड़े ही आहार के रूप में आवश्यक होती है।
Published on:
20 Mar 2018 12:29 pm

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