
आईआईएम के बोर्ड रूम में पत्रिका से बातचीत करते प्रो. रामकुमार काकानी।
ताबीर हुसैन @ रायपुर.आज आपको ऐसे शख्स के बारे में बताने जा रहे हैं जो शुरुआती पढ़ाई में जीरो रहा। तीसरी तक फेल होते रहा। 400 में से महज 30 नंबर मिला करते थे। एकाउंटेंट पिता के गुजरने के बाद कंधों पर घर की जिम्मेदारी आ गई। जेब में फूटी कौड़ी नहीं थी। परिवार चलाने के लिए कर्ज लेना पड़ा। उस वक्त की स्थिति को देखकर अंदाजा लगाना मुश्किल था कि वह व्यक्ति आज प्रीमियम इंस्टीट्यूट का डायरेक्टर बन जाएगा। जी हां। हम बात कर रहे हैं आईआईएम रायपुर के डायरेक्टर प्रो. रामकुमार काकानी की। पत्रिका से एक्सक्लुसिव इंटरव्यू में उन्होंने संघर्ष के दौर को साझा किया। वे कहते हैं, मुझे अच्छे से याद है कि जब दसवीं के नतीजे आए तो स्कूल में मेरी थर्ड रैंक थी। दोस्त कहते थे कि इसको तो कामा और फुल स्टॉप का नॉलेज नहीं। यह कैसे रैंकर बन गया।
एक सवाल ने सोचने पर किया मजबूर
आंध्रप्रदेश के राजमुंदरी में मेरी स्कूलिंग हुई और उसके बाद आंध्रा यूनिवर्सिटी से केमिकल इंजीनियरिंग की। केमिकल इंजीनियरिंग के बाद मैंने बोकारो स्टील प्लांट में नौकरी की। चूंकि मैं यहां सबसे छोटा था इसलिए मेरी नाइट शिफ्ट लगाई जाती थी। उस दौर में मेरे दिमाग में यह सवाल था कि कुछ लोग इतने अमीर कैसे और कुछ एकदम से गरीब। मेरा खुद का भी अनुभव था। मेरे कुछ रिश्तेदार अमीर थे। इसे समझने के लिए मैंने फाइनेंस के पेपर पढऩा शुरू कर दिया। साथ ही आईआईएम कोलकाता से पीएचडी भी करने लगा। यहां अध्ययन से पता चला कि हमारे यहां कुछ कंपनियां हैं लेकिन अमरीका और यूरोप जैसी कंट्रीस में कुछ खास वजूद नहीं बना पाईं। इस दौरान डेनमार्क भी जाना हुआ। वहां से आने के बाद 15 साल तक जेवियर स्कूल ऑफ मैनेजमेंट जमेशदपुर में पढ़ाया। इस बीच छह महीने डेनमार्क-यूरोप, छह महीने नाइजीरिया-अफ्रीका, छह महीना दुबई-यूएई और एक साल सिंगापुर में भी एजुकेशन पर काम किया।
दोस्त के कहने पर दिया कैट
मेरा एक दोस्त था। वह कैट की तैयारी कर रहा था। तीन बार उसने पटना में एग्जाम दिया लेकिन क्रैक नहीं कर पाया। जब वह चौथा प्रयास कर रहा था तो मैंने उसके फॉर्म में भूवनेश्वर भर दिया। इस पर वह कहने लगा अब जब तुमने सेंटर चेंज ही कर दिया तो तुम भी मेरे साथ पेपर दो। मैंने भी फॉर्म भर दिया। मेरा सलेक्शन भी हो गया। इस तरह मैं मैनेजमेंट की फील्ड में आ गया।
मसूरी में आया बड़ा बदलाव
एक बार मुझे महसूस हुआ कि सोशल इम्पेक्ट पर मैं कुछ नहीं कर पा रहा हूं। यह बात मुझे बहुत खटकती थी। भले मैं स्टूडेंट्स को पढ़ा रहा था लेकिन कुछ और भी करना चाहता था। साल 2012 में मैं लालबहादुर नेशनल एकेडमी और एडमिनिस्ट्रेशन से बतौर सलाहकार जुड़ा। यहां ढाई साल तक आईएएस और आईपीएस की ट्रेनिंग को करीब से देखा। यहां से मेरा नजरिया बदल गया। मैंने पाया कि न सिर्फ उनके काम के तरीके अलग होते हैं बल्कि उनकी समस्याएं भी जुदा होती हैं। कभी-कभी तो मुझे किसी अफसर को देखकर लगता है कि वे बंधुआ मजदूर हैं।
सीखने का कोई मौका नहीं गंवाया
मैंने कभी भी सीखने का कोई मौका नहीं गंवाया। जब भी मेरे पास कोई नया काम आया, मना नहीं किया। शायद यही वजह है कि आज मैं इस मुकाम पर हूं। आप सोचिए कि मैं केमिकल इंजीनियर था लेकिन फाइनेंस, स्ट्रेटजी और पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में लीडरशिप पढ़ाया। दरअसल, जब आपमें नई चीजों को सीखने की इच्छाशक्ति होती है तो आप डिफरेंट फील्ड में भी एक्सपर्टी हासिल कर सकते हैं। और यह जीवन के हर मोड़ पर काम आता है।
एचआर में अपॉचुर्निटी ज्यादा
कोई भी देश चार स्टेज से गुजरता है। जैसे अमरीका को ले लीजिए। वह चौथे स्टेज पर है। इस हिसाब से भारत अभी युवा है। आजादी के बाद करीब 75 सालों में भारत ने तरक्की की और अभी तीसरे स्टेज पर है। मुझे लगता है कि थर्ड स्टेज अभी 20 साल और रहेगा फिर चौथे चरण में हम प्रवेश कर जाएंगे। रही बात मैनेजमैंंट की किस ब्रांच में अपॉर्चुनिटी ज्यादा है तो मैं कहूंगा कि एचआर। यह न सिर्फ व्यक्तिगत बल्कि किसी भी देश के लिए अच्छा है। अगर हम खुद को और संस्था को समझ लें तो इससे बेहतर और क्या हो सकता है।
सबसे बड़े प्रबंधक भगवान कृष्ण
अगर हम महाभारत देखें तो उसमें भगवान कृष्ण वही करते नजर आए हैं जो एक लीडरशिप कोच करता है। आज के जमाने में लीडरशिप और मैनेजमेंट बड़े शब्द हैं लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि पुराने जमाने में इसकी महत्ता नहीं थी। श्रकृष्ण के किरदार से आपको मैनेजमैंट का पाठ नजर आएगा।
अगले 4-5 वर्षों में रैंकिंग बढ़ानी है
जिस समय आईआईएम रायपुर खुला, उस वक्त और भी आईआईएम खुले लेकिन वे उस मुकाम पर नहीं हैं जो रायपुर ने हासिल किया। 12 साल में ही एनआईआरएफ 15 तक पहुंच गई। अब इसे आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी हमारी है। मैं समझता हूं कि चार से पांच सालों में हम इसे 7 से 8 रैंक तक लेकर ही आएंगे।
Published on:
17 Mar 2022 08:48 pm

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