
रायपुर . 1877 ईसवीं को जब 14 साल का किशोर नरेन्द्र नाथ रायपुर आया, तब शायद ही यहां किसी को आभास रहा होगा कि यह नरेन्द्रनाथ भविष्य में स्वामी विवेकानंद के रूप में अपनी वैश्विक पहचान बनाएगा। नरेन्द्र अपने पिता विश्वनाथ दत्त सहित मां भुवनेश्वरी देवी, छोटे भाई महेन्द्र व बहन जोगेन्द्रबाला के साथ रायपुर में करीब दो साल रहे। यह कोलकाता के बाद नरेन्द्र (स्वामी विवेकानंद) का किसी एक स्थान पर व्यतीत किया हुआ सर्वाधिक समय था। असल में उनके पिता विश्वनाथ दत्त पेशे से वकील थे। काम के सिलसिले में ही वे रायपुर आए थे, यहां अधिक समय तक रुकने की वजह से उन्होंने परिवार को भी यहां बुला लिया। वे परिवार समेत रायपुर के बूढ़ापारा में रहे।
बताते हैं नरेन्द्र एवं उनका परिवार नागपुर से बैलगाड़ी के जरिए रायपुर पहुंचे। वहीं, कुछ संकेतों में व किताबों में उनके जबलपुर से ही बैलगाड़ी द्वारा मण्डला, कवर्धा होकर रायपुर आने की बात कही जाती है।
का अनुभव हुआ था।
डे भवन में बनाया बसेरा
विश्वनाथ दत्त रायपुर में अपने मित्र रायबहादुर भूतनाथ डे के घर पर ठहरे थे। यहां कोतवाली चौक से कालीबाड़ी चौक की ओर जाने वाली सडक़ पर बाएं हाथ में डे भवन स्थित है। भवन में स्वामी विवेकानंद से जुड़ी चीजें तो अब नहीं हैं, लेकिन रायबहादुर भूतनाथ डे के पुत्र हरिनाथ डे के संदर्भ में जानकारी देने वाला स्टोन जरूर मौजूद है, जिसमें उनके ३६ भाषाओं के जानकार होने की बात का उल्लेख है। डे भवन से नजदीक ही बूढ़ा तालाब स्थित है। बताते हैं कि रायपुर में रहने के दौरान नरेन्द्र नाथ (स्वामी विवेकानंद) स्नान करने बूढ़ा तालाब ही जाया करते थे, इसलिए ही बूढ़ा तालाब को शासन ने विवेकानंद सरोवर नाम दिया। तालाब के बीच टापू पर स्वामी विवेकानंद की ध्यान मुद्रा में विशालकाय प्रतिमा भी स्थापित की गई है।
Updated on:
12 Jan 2018 05:29 pm
Published on:
12 Jan 2018 01:09 pm
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