छत्तीसगढ़ गरियाबंद जिला के सुपेबेडा की पहचान देश-दुनिया में किडनी प्रभावित गांव के रूप में होती है। गांव में 6 साल पहले किडनी से मौत का सिलसिला जो शुरू हुआ था वो आज भी बदस्तूर जारी है। बीती रात हुई पुरेन्द्र आडिल की मौत के साथ मौत का आंकड़ा 78 पार पहुंच गया है। 6 साल में प्रदेश में सरकारें बदल गई, मगर सुपेबेडा की न तो तस्वीर बदली और न ही ग्रामीणों की तकदीर।
गरियाबंद. छत्तीसगढ़ गरियाबंद जिला के सुपेबेडा की पहचान देश-दुनिया में किडनी प्रभावित गांव के रूप में होती है। गांव में 6 साल पहले किडनी से मौत का सिलसिला जो शुरू हुआ था वो आज भी बदस्तूर जारी है। बीती रात हुई पुरेन्द्र आडिल की मौत के साथ मौत का आंकड़ा 78 पार पहुंच गया है। 6 साल में प्रदेश में सरकारें बदल गई, मगर सुपेबेडा की न तो तस्वीर बदली और न ही ग्रामीणों की तकदीर। ग्रामीण आज भी वही दूषित पानी पीने पर मजबूर हैं, जिसकी वजह से गांव में किडनी की बीमारी के फैलने की बात कही जा रही है।
फिर एक ग्रामीण की मौत
गरियाबंद. गरियाबंद जिले के दूरस्थ वनांचल का ग्राम सुपेबेड़ा जो किडनी प्रभावितों के गांव के नाम से भी जाना जाता है। जहां शनिवार को फिर एक परिवार का सहारा छिन गया। सुपेबेड़ा के 45 वर्षीय पुरेन्द्र आडिल की राजधानी से इलाज करा कर लौटने के 24 घंटे बाद मौत हो गई। जिससे पूरे गांव में एक बार फिर मातम के अलावा गुस्से का माहौल बना हुआ है। मृतक के परिजन एवं सुपेबेड़ा के ग्रामीण लगातार जारी मौत के कहर से सरकार की अव्यवस्था को लेकर खासे नाराज हैं। उनका कहना है कि सरकारे बदल गई, कई नेता-मंत्री यहां का दौरा कर रहे और सिर्फ आश्वासन देकर चले जाते हैं। मगर गांव असुविधा में कोई बदलाव नहीं आया है। ग्रामीण आज भी दूषित पानी पीने को मजबूर हैं।
शुक्रवार को रायपुर के डीकेएस से इलाज कराकर लौटा था : मृतक के परिजनों ने बताया कि पुरेन्द्र आडिल लंबे समय से किडनी बीमारी से पीडि़ता था। जिसके चलते हैं उसका इलाज चल रहा था। बीते कुछ दिनों से राजधानी में रहकर मृतक अपना इलाज करवा रहा था। शुक्रवार रात को अपना इलाज करा कर मृतक गांव पहुंचा था और शनिवार रात को उसने दम तोड़ दिया।
पुरेन्द्र आडिल की मौत किडनी की ही बीमारी से होना पूरी तरह गलत है। मल्टी आर्गन फेल होने के चलते युवक की मौत हुई है। उसे टीबी की भी बीमारी थी और जिला स्वास्थ्य अमला लगातार उसका इलाज करवा रहा था। युवक शुक्रवार को हास्पिटल जबरदस्ती इलाज छोड़कर गांव आया था।
एनआर नवरत्ने