हार सब्द ले हारे, हरइया, हरवइया जइसे सब्द घलो बनथे। जादा करके समाज म देखे गे हे गे हारे मनखे के पूछपरख कम हो जथे। कतकोन बडक़ा मनखे हो, धनवान हो, नेता हो, साहेब हो, खिलाड़ी हो, हारे के बाद लोगनमन के नजर म गिर जथे। वोमन हारे के कतकोन कारन बतांय, सफई दंय, फेर लोगनमन मानबेच नइ करंय। बस वोकर कमी-गलती गिनाय के सुरू कर देथें। अइसे हो-हल्ला मचाथें के हारे मनखे एकदम मजबूर, असहाय, बेबस नजर आथें।