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ताबीर हुसैन @ रायपुर। हाल ही में साइंस कॉलेज मैदान में राष्ट्रीय आदिवासी नृत्य समारोह का आयोजन किया गया था। शहरवासियों को ट्राइबल कल्चर की वैराइटी देखकर हैरानी हुई थी। आज हम आपको एक ऐसी ही खबर सुनाकर आश्चर्य में डालने जा रहे हैं। कोटा निवासी विक्रम नायक और पत्नी पल्लवी धुरंधर नायक ने लाखों की नौकरी छोड़ आदिवासी कहानियों, किस्सागोई और उनकी कलाकृतियों को इंटरनेशनल पहचान देने के लिए एनिशिएटिव लिया है। दंपती ने द ट्राइबल टेल नाम से कंपनी और इसी नाम से वेबसाइट बनाई है जिसकी लॉन्चिंग हाल ही में की गई। इसके जरिए वे यहां के कलाकारों की कलाकृति को दूर दुनिया तक पहुंचाएंगे। कलाकृति के साथ कलाकारों का नाम भी रहेगा।
ऑस्ट्रेलिया में 12 साल जॉब
विक्रम 12 साल से ऑस्ट्रेलिया में रहकर एक मल्टीनेशनल कंपनी में जॉब कर रहे थे, जबकि पल्लवी दिल्ली में डिजाइनिंग फर्म में वर्क कर रही थीं। विक्रम को हर महीने 3 से 3.5 लाख रुपए और पल्लवी को 1 से 1.5 लाख रुपए सैलरी मिलती थी। पल्लवी के भाई शुभम धुरंधर को अमरीका में ढाई लाख रुपए की सैलरी थी। तीनों ने नौकरी छोड़ ट्राबइल टेल से नाता जोड़ लिया। नायक ने बताया कि ऑस्ट्रेलिया के आदिवासियों से मिलने के बाद जो चीजें समझ में आईं उसके मुताबिक इंडिया और वहां के आदिवासी एक-दूसरे की भाषा समझ सकते हैं। उनकी कहानियां मिलती हैं। वे आज भी एक-दूसरे से रिलेटेड हैं।
एक सवाल में छिपा था यह आइडिया
पल्लवी ने बताया कि हम दोनों ने कई देशों की सैर की है। हमने पाया कि हर जगह एक सवाल कॉमन होता है कि आप कहां से हैं? यही सवाल हमें इस तरफ खींच लाया। बस्तर दौरे में ट्राइबल आर्ट ने ध्यान खींचा। एक आर्टिस्ट से बातचीत हुई तो उसने कहा कि यह कला खत्म होने वाली है। हमारे बच्चे अब इंट्रेस्ट नहीं ले रहे हैं क्योंकि कला को वाजिब दाम नहीं मिल पा रहा। जो सवाल हमारे साथ अब तक था उसका जवाब आर्टिस्ट की इस चिंता में छिपा था। हमने तय किया कि ऐसा कुछ किया जाए जिससे आर्टिस्टों को उनके हुनर की सही कद्र मिल सके और बस्तर आर्ट कभी खत्म न हो। तबसे हमने इस ओर काम करना शुरू कर दिया था।
खरीदने वाले को पता चल सके कि इसे बनाया किसने
नायक ने बताया कि अक्सर किसी भी कला को दाम तो मिल जाता है लेकिन नाम नहीं। हम वेबसाइट में हर कलाकृति बनाने वाले का नाम लिखेंगे ताकि जो भी इसे खरीदेगा उसे पता रहे कि मास्टरपीस किसने बनाई। बस्तर में रॉट ऑयरन, कोसा, टेराकोटा समेत तमाम आर्ट को इसमें रखा गया है। आदिवासियों के साहित्य, गीत-संगीत और कविताओं को भी पहचान देने की जिम्मेदारी है।
Published on:
05 Jan 2020 10:37 pm

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