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जब दर्शक को पत्रकार समझ बैठे तिग्मांशु, बोले- थोड़ा दयालु बनिए

हिंदी फिल्म बनाने की बात पर अशोक मिश्र ने उठाए सवाल

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जब दर्शक को पत्रकार समझ बैठे तिग्मांशु, बोले- थोड़ा दयालु बनिए

संस्कृति विभाग परिसर स्थित मुक्ताकाशी मंच में हमर पहुना को संबोधित करते तिग्मांशु

ताबीर हुसैन @ रायपुर.तिग्मांशु धुलिया इन दिनों रायपुर में हैं। वे तारिक खान की फिल्म अनर्की की शुटिंग कर रहे हैं। रविवार को एक कार्यक्रम में वे दर्शक के सवाल को सुनकर कन्फ्यूज हो गए कि कहीं वह पत्रकार तो नहीं। उन्होंने पूछ भी लिया कि आप पत्रकार हैं? थोड़ा दयालु बनिए। वे संस्कृति विभाग की ओर से मुक्ताकाशी मंच पर आयोजित हमर पहुना कार्यक्रम में पहुंचे थे। विषय था- सिनेमा के सतरंगी आसमान पर छत्तीसगढ़ का भविष्य और संभावनाएं। इसमें तिग्मांशु ने छत्तीसगढ़ी फिल्मकारों को हिंदी में फिल्म बनाने की हिदायत दे डाली। इस पर संस्कृति विभाग के रिटायर कर्मी अशोक मिश्र ने सवाल उठा दिए। वे बतौर दर्शक कार्यक्रम में शामिल हुए थे। सवाल था - छत्तीसगढ़ी फिल्म इंडस्ट्री का बड़ा इतिहास है। अब तक 100 से ज्यादा फिल्में बन चुकी हैं। आप कैसे कह सकते हैं हिंदी में बनाएं। तिग्मांशु ने कहा कि आप जो पूछ रहे हैं उसका जवाब आपके भीतर है। मैं इसका उत्तर नहीं दे सकता। अगर दूं भी तो वह नकली होगा। आप पत्रकार हैं? थोड़ा दयालु बनिए न।

दो असिस्टेंट रायपुर के होंगे

द ग्रेट इंडियन मर्डर पार्ट 2 की शूटिंग जल्द ही छत्तीसगढ़ होगी। मैं यहां की प्रतिभाओं को मौका दूंगा। दो युवा मुझे असिस्ट करेंगे। उन्हें न सिर्फ सीख मिलेगी बल्कि तजुर्बा भी मिलेगा ताकि वे फिल्म मेकिंग में आगे बढ़ सकें। हर कोई शाहरूख तो नहीं बन सकता लेकिन उन्हें मुंबई जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी बल्कि बुलाया जाएगा।

इसलिए गाने कम रखता हूं

मेरी फिल्मों में गाने कम होते हैं क्योंकि गानों की शुटिंग में पैसे ज्यादा लगते हैं। एक गाना चार दिन में शूट होता है तो कम से कम 25 लाख तो खर्च होंगे ही। जब स्टार ही न हों तो गाने का क्या मतलब। ऐसा भी नहीं कि बिल्कुल गाने नहीं होते। बुलेट राजा में तो कई गाने थे। मैं हमेशा बजट और मौके के हिसाब से गाना रखना पसंद करता हूं।

दिमाग घर में रखकर क्यों देखें फिल्में

तकनीक से लैस फिल्मों को लेकर कहा जाता है कि यह सिर्फ रोमांच और एंटरटेनमेंट के लिए है। इसलिए दिमाग घर रखकर जाएं। ऐसा क्यों? जबकि आज का दर्शक तो समझदार है। मैं इसे अपनी इंटेलीजेंसी की बेइज्जती मानता हूं।

मुझे कमरों में फिल्में बनाना पसंद नहीं

किसी को चाइनीज पसंद है तो किसी को इंडियन। किसी भी फिल्म में मैं विजुअल देखता हूं। उसमें कितना लैंडस्कैप है। क्योंकि मैं सिनेमा बना रहा हूं, टीवी नहीं। मुझे बंद कमरों वाली फिल्में बनाना पसंद नहीं।

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