आज के यूथ गब्बर को करते हैं फॉलो

रायपुर फिल्म फेस्टिवल में एक अखबार के प्रधान संपादक मुकेश भारद्वाज ने रखे अपराध और सिनेमा पर अपने विचार

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Apr 15, 2016
raipur film festival
रायपुर.
सिनेमा आज के युग में सोशल मीडिया का सबसे बड़ा माध्यम बनकर उभर रहा है। फिल्म में दिखाए जाने वाले दृश्य समाज के हर वर्ग के लोगों पर एक अमिट छाप छोड़ता है। यही वजह है कि फिल्म में रियल लाइफ से रील लाइफ को दिखाने की कोशिश की जाती है, ताकि पब्लिक पॉजिटिव चीजों को ग्रहण कर अपना चरित्र-निर्माण करें। लेकिन फिल्मों का क्रेज आज के यूथ पर इतना हो गया है कि वे स्वामी विवेकानंद, महात्मा गांधी, पं. जवाहरलाल नेहरू जैसे महापुरुषों का अनुसरण करने के बजाए फिल्म के विलन गब्बर को अधिक फॉलो करते हैं। यह कहना है रायपुर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में शिरकत करने राजधानी पहुंचे एक हिन्दी अखबार के प्रधान संपादक मुकेश भारद्वाज का। जिन्होंने अपराध और सिनेमा विषय पर अपने विचार रखे।


फिल्मों की वजह से क्राइम

उन्होंने कहा कि अमूमन क्राइम फिल्मों के माध्यम से बढ़ रहा है। इसका मुख्य कारण है कि न्यू जनरेशन सिनेमा में दिखाए जाने वाली पॉजिटिव मैसेज को दरकिनार करते हुए निगेटिव रोल की तरफ अटै्रक्ट हो रहे हैं। फिल्मों की तर्ज पर रोड रेस, ग्रुपिंग और विलेन का किरदार निभाना पसंद करते हैं। यही वजह है कि इन्हें फॉलो करते-करते ये स्वयं अपराध की दुनिया में प्रवेश कर लेते हैं।

मुकेश भारद्वाज कहते हैं कि फिल्मों ने समाज की दिशा और दशा को सुधारने में अपना योगदान दिया है, लेकिन लोगों की मानसिकता ने इसका नजरिया ही बदलकर रख दिया। आज का युग एेसा है कि फिल्म में हीरो को नहीं विलेन के किरदार को यूथ काफी पसंद करते है। इसके पीछे विलेन की ठाठ, पॉवर और एेशो-आराम को दिखाना है। जबकि हीरो के किरदार को फिल्म में संघर्ष करते हुए दिखाया जाता है।


क्राइम पर छिड़ी बहस

अपराध और सिनेमा विषय पर चर्चा एक अहम मुद्दा बनकर उभरा। गुरुवार को चर्चा के दौरान अपराध और सिनेमा को लेकर एक्सपर्ट और ऑडियंस के बीच काफी डिबेट भी हुआ। इस बीच हंस के संपादक ने रेप केसेस में मृत्युदंड को गलत ठहराते हुए कहा कि रेप के अपराधी को मृत्युदंड न देकर उसके गुनाह को देखते हुए उम्र कैद या फिर कुछ वर्षों का कारावास तय करना चाहिए। इस दरमियान हरियाणा से आई नेहा धवन ने निर्भया कांड का हवाला देते हुए अपराधी की मानसिकता के बारे में विचार रखा। उन्होंने कहा कि हिन्दुस्तान में रिसर्च तो हो रहे हैं मगर उनकी मानसिक बदलाव पर अभी तक कुछ निष्कर्ष अब तक नहीं निकला है।
Published on:
15 Apr 2016 12:54 am
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