
कश्मीरी पंडित, ( File Photo Credit - IANS)
तारीख- 19 जनवरी, 1990। तापमान माइनस में था, लेकिन पूरी कश्मीर घाटी नफरत की आग में तप रही थी। मस्जिदों के लाउडस्पीकर से गूंजते खौफनाक नारे- 'रालिव, गालिव या चालिव' (धर्म बदलो, मरो या भाग जाओ)- ने हजारों साल पुरानी कश्मीरी पंडित सभ्यता को महज एक रात में तहस-नहस कर दिया। आज, 19 जनवरी, 2026 को इस ऐतिहासिक त्रासदी के 36 साल पूरे हो रहे हैं। कश्मीरी पंडित समुदाय इसे 'ब्लैक डेट' यानी काला दिवस के रूप में मना रहा है। अनुच्छेद 370 हटने और 'नया कश्मीर' बनने के तमाम सरकारी दावों के बीच, एक सवाल आज भी अनुत्तरित है- क्या वो पंडित अपने घर लौट पाए? आंकड़े और जमीनी हकीकत एक दर्दनाक दास्तां बयां करते हैं।
जम्मू के जगती टाउनशिप रिफ्यूजी कैंप में रहने वाले भूषण लाल भट्ट के हाथ में आज भी कश्मीर के उस मंदिर का फोटो है जिसे तोड़ दिया गया था। वे रुंधे गले से कहते हैं, '36 साल हो गए। सरकारें बदलीं, नक्शे बदले, लेकिन हमारी किस्मत नहीं बदली। जब वापसी होगी तब सबसे पहले शिव मंदिर बनवाऊंगा। हमें हर साल लगता है कि नया साल 'पनुन कश्मीर' यानी अपना कश्मीर में होगा।
भले ही सरकार सुरक्षा के कड़े दावे करती हो, लेकिन पिछले तीन सालों में हुई 'टारगेट किलिंग' की घटनाओं ने भरोसे की नींव हिला दी है। वंधामा कैंप में रहने वाले सुमित रैना, (बदला नाम) स्कूल में टीचर हैं। बताते हैं, 'जब दो साल के थे तब हमें कश्मीर में अपने घरों को छोड़ना पड़ा, आज हम यहां नौकरी करने आए हैं लेकिन अपने परिवार को साथ नहीं रख पा रहे हैं। क्योंकि सरकार और समाज से सुरक्षा का पक्का भरोसा नहीं मिल रहा।'
| वर्ष | मुस्लिम समुदाय | कश्मीरी पंडित |
|---|---|---|
| 1989–90 | 92–95% | 5–8% |
| 2025–26 | 99.9% | 0.1% |
Published on:
19 Jan 2026 03:15 am
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