
रमज़ान का महीना और अलविदा जुमा। ( सांकेतिक फोटो: AI)
Jumuatul Wida : पवित्र माह-ए-रमज़ान (Ramadan) अब अपने आखिरी पड़ाव पर है। दुनिया भर के मुस्लिम समुदाय के लिए यह महीना इबादत, अल्लाह की रहमत और गुनाहों से माफी मांगने का सबसे बेहतरीन वक्त होता है। इस पाक महीने में 'अलविदा जुमा' (Jumuatul Wida) का एक बेहद खास और जज्बाती मकाम है। आइए कुरान और हदीस की रोशनी में समझते हैं कि रमज़ान, इसके अशरे और जुमातुल विदा की क्या अहमियत है। साल 2026 में भारत में रमज़ान के पवित्र महीने की शुरुआत 19 फरवरी (गुरुवार) को पहले रोज़े के साथ हुई थी। इसके साथ ही मस्जिदों में तरावीह की नमाज का सिलसिला शुरू हो गया था। अब यह बरकतों वाला महीना अपने अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण दौर से गुज़र रहा है। चांद दिखने या न दिखने के हालात को देखते हुएपहले अनुमान यह था कि चांद के दीदार के आधार पर इस बार जुमातुल विदा 13 या 20 मार्च को अदा किया जाएगा। अब उलेमा ने यह ऐलान कर दिया है कि भारम में अलविदा जुमा की नमाज़ 13 मार्च को अदा की जाएगी।
इस्लाम में रमज़ान को तमाम महीनों का सरदार (मुखिया) कहा गया है। रोज़ा (उपवास) इस्लाम के 5 मुख्य स्तंभों में से एक है। रमजान का मुख्य उद्देश्य इंसान के अंदर 'तकवा' (परहेजगारी और बुराइयों से बचने का संकल्प) पैदा करना है। यह महीना सब्र, गरीबों की भूख-प्यास को महसूस करने और रूहानी पाकीज़गी (Spiritual Purification) का प्रशिक्षण देता है।
अरबी भाषा में 'अशरा' (Ashra) का मतलब 'दस' (10) होता है। रमज़ान के पूरे महीने (29 या 30 दिन) को इबादत के लिहाज़ से 10-10 दिनों के तीन हिस्सों में बांटा गया है:
पहला अशरा (रहमत): 1 से 10 रोज़े तक का समय अल्लाह की 'रहमत' का होता है।
दूसरा अशरा (मगफिरत): 11वें से 20वें रोज़े तक का समय 'मगफिरत' (क्षमा) का होता है, जिसमें अल्लाह अपने बंदों के गुनाहों को माफ करता है।
तीसरा अशरा (निजात): 21वें रोज़े से चांद रात तक का आखिरी अशरा जहन्नुम (नरक) की आग से 'निजात' (मुक्ति) पाने का माना जाता है। शब-ए-कद्र भी इसी अशरे में तलाशी जाती है।
इस्लाम में जुमा (शुक्रवार) को हफ्ते का सबसे अफज़ल (सर्वश्रेष्ठ) दिन माना गया है।
कुरान के अनुसार: पवित्र कुरान के 62वें अध्याय का नाम 'सूरह अल-जुमा' है। इसमें अल्लाह फरमाता है, "ऐ ईमान वालों! जब जुमे के दिन नमाज़ के लिए अज़ान दी जाए, तो अल्लाह के ज़िक्र (नमाज़) की तरफ दौड़ पड़ो और खरीद-फरोख्त (व्यापार) छोड़ दो।"
हदीस के अनुसार: सहीह मुस्लिम की एक प्रामाणिक हदीस के मुताबिक, पैगंबर मुहम्मद (PBUH) ने फरमाया: "जिन दिनों में सूरज निकलता है, उनमें सबसे बेहतरीन दिन जुमे का है। इसी दिन आदम (A.S) पैदा किए गए।" एक अन्य हदीस (बुखारी) में ज़िक्र है कि जुमे के दिन एक ऐसी घड़ी आती है, जिसमें बंदा अल्लाह से जो भी जाइज़ दुआ मांगता है, वह कुबूल होती है।
'अलविदा' का अर्थ है विदाई और 'जुमातुल विदा' का मतलब है रमज़ान का आखिरी जुमा (शुक्रवार)। चूंकि जुमे का दिन दुआओं की कुबूलियत का होता है और रमजान का महीना रहमतों का, इसलिए जब रमज़ान हमसे विदा हो रहा होता है, तो मुस्लिम समुदाय के लोग इस आखिरी जुमे की नमाज़ में खास तौर पर अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं। यह दिन इस बात का अहसास दिलाता है कि बरकतों का यह महीना अब जा रहा है, इसलिए जाते-जाते ज्यादा से ज्यादा इबादत करके अल्लाह की रज़ामंदी हासिल कर ली जाए।
अलविदा जुमा की नमाज़ के बाद अब सभी की नज़रें ईद के चांद (शव्वाल के हिलाल) पर टिक जाएंगी। 29 का चांद दिखने पर अगले दिन ईद-उल-फित्र मनाई जाएगी, अन्यथा 30 रोज़े पूरे कर के ईद मनाई जाएगी।चांद दिखने के बाद ही ईद होती है और उसी के अनुसार ईद का अवकाश होता है। अलविदा जुमे के दिन बाजारों में भी काफी रौनक देखने को मिलती है। नमाज के बाद लोग ईद की खरीदारी के लिए निकलते हैं। इस दिन दान (सदका-ए-फित्र और ज़कात) देने का भी खास महत्व है ताकि गरीब तबका भी ईद की खुशियों में बराबर का शरीक हो सके।
Updated on:
12 Mar 2026 10:28 pm
Published on:
12 Mar 2026 10:27 pm
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