12 मार्च 2026,

गुरुवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

रमज़ान 2026: क्या है ‘अलविदा जुमा’, क्यों है इसकी इतनी अहमियत, और कब है ईद की छुट्टी ? जानिए

Ramadan: भारत में 19 फरवरी से शुरू हुए मुकद्दस माह-ए-रमज़ान का अब आखिरी दौर चल रहा है। इस लेख में जानें अलविदा जुमे (जुमातुल विदा) की अहमियत, रमज़ान के अशरे और कुरान व हदीस की रोशनी में जुमे की फजीलत।

3 min read
Google source verification

भारत

image

MI Zahir

Mar 12, 2026

Ramadan Alvida Jumma

रमज़ान का महीना और अलविदा जुमा। ( सांकेतिक फोटो: AI)

Jumuatul Wida : पवित्र माह-ए-रमज़ान (Ramadan) अब अपने आखिरी पड़ाव पर है। दुनिया भर के मुस्लिम समुदाय के लिए यह महीना इबादत, अल्लाह की रहमत और गुनाहों से माफी मांगने का सबसे बेहतरीन वक्त होता है। इस पाक महीने में 'अलविदा जुमा' (Jumuatul Wida) का एक बेहद खास और जज्बाती मकाम है। आइए कुरान और हदीस की रोशनी में समझते हैं कि रमज़ान, इसके अशरे और जुमातुल विदा की क्या अहमियत है। साल 2026 में भारत में रमज़ान के पवित्र महीने की शुरुआत 19 फरवरी (गुरुवार) को पहले रोज़े के साथ हुई थी। इसके साथ ही मस्जिदों में तरावीह की नमाज का सिलसिला शुरू हो गया था। अब यह बरकतों वाला महीना अपने अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण दौर से गुज़र रहा है। चांद दिखने या ​न दिखने के हालात को देखते हुएपहले अनुमान यह था कि चांद के दीदार के आधार पर इस बार जुमातुल विदा 13 या 20 मार्च को अदा किया जाएगा। अब उलेमा ने यह ऐलान कर दिया है कि भारम में अलविदा जुमा की नमाज़ 13 मार्च को अदा की जाएगी।

​पवित्र रमज़ान के महीने का महत्व

इस्लाम में रमज़ान को तमाम महीनों का सरदार (मुखिया) कहा गया है। रोज़ा (उपवास) इस्लाम के 5 मुख्य स्तंभों में से एक है। रमजान का मुख्य उद्देश्य इंसान के अंदर 'तकवा' (परहेजगारी और बुराइयों से बचने का संकल्प) पैदा करना है। यह महीना सब्र, गरीबों की भूख-प्यास को महसूस करने और रूहानी पाकीज़गी (Spiritual Purification) का प्रशिक्षण देता है।

अशरा क्या होता है और इसका महत्व ?

अरबी भाषा में 'अशरा' (Ashra) का मतलब 'दस' (10) होता है। रमज़ान के पूरे महीने (29 या 30 दिन) को इबादत के लिहाज़ से 10-10 दिनों के तीन हिस्सों में बांटा गया है:

पहला अशरा (रहमत): 1 से 10 रोज़े तक का समय अल्लाह की 'रहमत' का होता है।

दूसरा अशरा (मगफिरत): 11वें से 20वें रोज़े तक का समय 'मगफिरत' (क्षमा) का होता है, जिसमें अल्लाह अपने बंदों के गुनाहों को माफ करता है।

तीसरा अशरा (निजात): 21वें रोज़े से चांद रात तक का आखिरी अशरा जहन्नुम (नरक) की आग से 'निजात' (मुक्ति) पाने का माना जाता है। शब-ए-कद्र भी इसी अशरे में तलाशी जाती है।

कुरान और हदीस के हिसाब से रमज़ान के जुमे की अहमियत

इस्लाम में जुमा (शुक्रवार) को हफ्ते का सबसे अफज़ल (सर्वश्रेष्ठ) दिन माना गया है।

कुरान के अनुसार: पवित्र कुरान के 62वें अध्याय का नाम 'सूरह अल-जुमा' है। इसमें अल्लाह फरमाता है, "ऐ ईमान वालों! जब जुमे के दिन नमाज़ के लिए अज़ान दी जाए, तो अल्लाह के ज़िक्र (नमाज़) की तरफ दौड़ पड़ो और खरीद-फरोख्त (व्यापार) छोड़ दो।"

हदीस के अनुसार: सहीह मुस्लिम की एक प्रामाणिक हदीस के मुताबिक, पैगंबर मुहम्मद (PBUH) ने फरमाया: "जिन दिनों में सूरज निकलता है, उनमें सबसे बेहतरीन दिन जुमे का है। इसी दिन आदम (A.S) पैदा किए गए।" एक अन्य हदीस (बुखारी) में ज़िक्र है कि जुमे के दिन एक ऐसी घड़ी आती है, जिसमें बंदा अल्लाह से जो भी जाइज़ दुआ मांगता है, वह कुबूल होती है।

अलविदा जुमा या जुमातुल विदा क्या होता है ?

'अलविदा' का अर्थ है विदाई और 'जुमातुल विदा' का मतलब है रमज़ान का आखिरी जुमा (शुक्रवार)। चूंकि जुमे का दिन दुआओं की कुबूलियत का होता है और रमजान का महीना रहमतों का, इसलिए जब रमज़ान हमसे विदा हो रहा होता है, तो मुस्लिम समुदाय के लोग इस आखिरी जुमे की नमाज़ में खास तौर पर अपने गुनाहों की माफी मांगते हैं। यह दिन इस बात का अहसास दिलाता है कि बरकतों का यह महीना अब जा रहा है, इसलिए जाते-जाते ज्यादा से ज्यादा इबादत करके अल्लाह की रज़ामंदी हासिल कर ली जाए।

इसी के साथ ईद की तैयारियां शुरू होंगी

अलविदा जुमा की नमाज़ के बाद अब सभी की नज़रें ईद के चांद (शव्वाल के हिलाल) पर टिक जाएंगी। 29 का चांद दिखने पर अगले दिन ईद-उल-फित्र मनाई जाएगी, अन्यथा 30 रोज़े पूरे कर के ईद मनाई जाएगी।चांद दिखने के बाद ही ईद होती है और उसी के अनुसार ईद का अवकाश होता है। अलविदा जुमे के दिन बाजारों में भी काफी रौनक देखने को मिलती है। नमाज के बाद लोग ईद की खरीदारी के लिए निकलते हैं। इस दिन दान (सदका-ए-फित्र और ज़कात) देने का भी खास महत्व है ताकि गरीब तबका भी ईद की खुशियों में बराबर का शरीक हो सके।