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पिता ने कहा- काश कोई कानून का पढ़ा लिखा होता तो ये दिन नहीं देखना पड़ता, बेटी ने पूरा किया सपना

पिता को सरकारी केस की उलझनों से निकालने के लिए बेटी ने पूरा किया सपना

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पिता ने कहा- काश कोई कानून का पढ़ा लिखा होता तो ये दिन नहीं देखना पड़ता, बेटी ने पूरा किया सपना

रायपुर. अगर अपने जीवन में कुछ कर दिखाने जज़्बा हो तो हर मुश्किल भी आसान लगती है। ऐसा ही कुछ छत्तीसगढ़ में रहने वाली एक आदिवासी छात्रा ने कर दिखाया। एक पिता सरकारी केस में फंसे थे इससे वे हमेशा परेशान रहते थे।सरकारी केस में फंसने से घर पर यूं ही कह दिया कि घर में कोई कानून का पढ़ा लिखा होता तो आज उन्हें सरकारी केस के दांव पेच मे उलझना नहीं पड़ता।इस बात को सुन बेटी ने अपने पिता को सरकारी केस की उलझनों से निकालने के लिए जज बनने की ठान ली। ये संकल्प ऐसा जुनून बना की आखिरकार आदिवासी छात्रा जज बनकर अपने सपने साकार कर लिया।

यह मामला जशपुर नगर जिले के पत्थलगांव क्षेत्र का है। पिछले कुछ सालों पहले पत्थलगांव क्षेत्र के सुदुर वनवासी अंचल में रहने वाली आदिवासी छात्रा गायत्री पैंकरा के सामने उसके पिता एक सरकारी केस में फंसने के बाद यूं ही कह दिए कि घर में कोई कानून का पढ़ा लिखा होता तो आज उन्हें सरकारी केस के दांव पेच मे उलझना नहीं पड़ता। इस बात को सुनने के बाद छात्रा गायत्री पैंकरा ने कानून की पढ़ाई कर इस क्षेत्र में ऊंचा मुकाम पाने की ठान ली। उसके द्वारा अपनी प्रारंभिक शिक्षा ब्लाक के पतराटोली जैसे एक ग्रामीण अंचल के स्कूल में हासिल की, उसके बाद ये माध्यमिक शिक्षा प्राप्त करने गांव के ही पंडरीपानी स्कूल मे दाखिला लिया।

अपनी दसवीं तक की पढ़ाई पूरी करने के बाद ये कांसाबेल के हाईस्कूल से बारहवी की परीक्षा उत्तीर्ण की और अपनी स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी करने के लिए उसने अंबिकापुर के होलीक्रॉस महाविद्यालय का चयन किया, जहां से उसने वर्ष 2014 मे स्नातकोत्तर की परीक्षा भी उत्तीर्ण कर ली और वहीं से बीए, एलएलबी की भी पढ़ाई पूरी की, बाद में ये बिलासपुर जाकर छत्तीसगढ़ न्यायिक सेवा परीक्षा की तैयारी करते हुए उसे भी अच्छे अंको से उत्तीर्ण कर लिया। आज सुदुर अंचल की रहने वाली छात्रा गायत्री पैंकरा अंबिकापुर सत्र न्यायालय मे चतुर्थ वर्ग न्यायाधीश के पद पर रहकर अपनी सेवा दे रही है।

गायत्री पैंकरा की राह इतनी आसान नहीं थी पढाई करने के दौरान उन्हे आभाव एवं रिश्तेदारो के ताने सहने पड़े। उसके अनुसार रिश्तेदार उन्हे कानून की पढ़ाई कर वकील बनने मे कोई खास बात ना रहने की सलाह देते थे। लेकिन उसकी चाह तो वकील के पेशे से भी कही और आगे की थी। ये आज अपने आदिवासी अंचल की छात्राओ को संदेश देकर कहती है कि सफलता का कोई शार्टकट नहीं होता,उनका कहना है कि पढ़ाई के प्रति सजग रहने से रास्ते मे आने वाली कठिनाईयों को हस्ते-हस्ते पार किया जा सकता है और मंजिल पाई जा सकती है।

वनवासी अंचल की बेटी गायत्री पैंकरा के दृण निश्चय के बाद चतुर्थ वर्ग न्यायाधीश बनने से ब्लाक की एक दर्जन गांव के लोगो ने गायत्री पैंकरा के माता-पिता व छोटी बहन को सम्मानित किया। स्कूल कालेज तक सायकल से सफर तय करना आसान नहीं था। लेकिन उनके भीतर पढऩे व कुछ कर गुजरने की चाह के आगे कोई भी बाधा टीक ना सकी। न्यायिक सेवा में जाने के लिए इनकी जी तोड़ मेहनत की बदौलत ही सीजी ज्यूडिशियल सविर्सेज की परीक्षा उत्तीर्ण कर आज ये जज बनी है।