
एक कथा के अनुसार राम ने रावण पर विजय प्राप्त करने हेतु नवरात्र व्रत किया था, ताकि उनमें शक्ति की देवी दुर्गा जैसी शक्ति आ जाए अथवा दुर्गा उनकी विजय में सहायक बनें। देवी दुर्गा शक्ति की देवी हैं और शक्ति प्राप्त करने हेतु शस्त्र भी आवश्यक है, इसलिए राम ने दुर्गा सहित शस्त्र पूजा कर शक्ति संपन्न होकर दशहरे के दिन ही रावण पर विजय प्राप्त की थी। तभी से नवरात्र में शक्तिएवं शस्त्र पूजा की परंपरा कायम हो गई।
इस प्रसंग से अन्य घटनाएं भी जुड़ी हैं, जो शक्ति एवं शस्त्र पूजा की परंपरा को बल प्रदान करती हैं। ऐसी मान्यता है कि इंद्र भगवान ने दशहरे के दिन ही असुरों पर विजय प्राप्त की थी। महाभारत का युद्ध भी इसी दिन प्रारंभ हुआ था और पांडव अपने अज्ञातवास के बाद इसी दिन पांचाल आए थे। वहां पर अर्जुन ने धनुर्विद्या की निपुणता के आधार पर, द्रौपदी को स्वयंवर में जीता था। ये सभी घटनाएं शस्त्र पूजा की परंपरा से जुड़ी हैं। दशहरे के दिन शमी वृक्ष की पूजा भी की जाती है। इस सबंध में भी अनेक कथाएं प्रचलित हैं।
शस्त्र पूजा की यह परंपरा भारत की रियासतों में बड़ी धूमधाम से मनाई जाती रही हैं। रियासतों में शस्त्रों के साथ जुलूस निकाला जाता था। राजा विक्रमादित्य ने दशहरा के दिन ही देवी हरसिद्धि की आराधना-पूजा की थी। छत्रपति शिवाजी ने भी इसी दिन देवी दुर्गा को प्रसन्न करके तलवार प्राप्त की थी, ऐसी मान्यता है। तभी से मराठा अपने शत्रु पर आक्रमण की शुरुआत दशहरे से ही करते थे। महाराष्ट्र में शस्त्र पूजा आज भी अत्यंत धूमधाम से होती हैं और इसे ‘सीलांगण एवं अहेरिया’ के नाम से पुकारा जाता है। अर्थात मराठे इस दिन अपने शस्त्रों की पूजा कर दसवें दिन ‘सीलांगण’ के लिए प्रस्थान करते थे।
‘सीलांगण’ का अर्थ होता है सीमा उल्लंघन अर्थात वे दूसरे राज्य की सीमा का उल्लंघन करते थे। इसमें सर्वप्रथम नगर के पास स्थित छावनी में शमी वृक्ष की पूजा की जाती थी, उसके बाद पेशवा पूर्व निश्चित खेत में जाकर मक्का तोड़ते थे और तब वहां उपस्थित लोग मिलकर उस खेत को लूट लेते थे। दशहरे के दिन एक विशेष दरबार भी लगाया जाता था, जिसमें बहादुर मराठों की पदोन्नोति की जाती थीं। राजपूतों (राजपूताना) में भी सीलांगण प्रथा प्रचलित थी। किंतु ‘सीलांगण’ से पूर्व वे ‘अहेरिया’ करते थे अर्थात इस दिन वे शस्त्र एवं शमी वृक्ष की पूजा कर विजय के रूप में दूसरे राज्य का ‘अहेर’ करते थे। अर्थात शिकार मानकर आक्रमण करते थे। साथ ही दुर्गा अथवा राम की मूर्ति को पालकी में रखकर जुलूस के रूप में सीमा पार करते थे। महिलाएं भी इस अवसर पर पूजा करती हैं एवं व्रत रखती हैं।
शमी वृक्ष की पूजा भी की जाती है
एक कथा के अनुसार जब राजा विराट की गायों को कौरवों से छुड़ाने के लिए अज्ञातवासी अर्जुन ने अपने अज्ञातवास के दौरान शमी की कोटर में छिपाकर रखे अपने गांडीव धनुष को फिर से धारण किया, तो पांडवों ने शमी वृक्ष की पूजा कर गांडीव धनुष की रक्षा हेतु शमी वृक्ष का आभार प्रदर्शन किया, तभी से शस्त्र पूजा के साथ ही शमी वृक्ष की पूजा भी होने लगी। एक अन्य कथा के अनुसार एक बार राजा रघु के पास एक साधु दान प्राप्त करने हेतु आया। जब रघु अपने खजाने से धन निकालने गए, तो खजाना खाली पाया। परिणामस्वरूप रघु क्रोधवश इंद्र पर चढ़ाई करने को तैयार हो गए। इंद्र ने रघु के डर से अपने बचाव हेतु शमी वृक्ष के पत्तों को सोने का कर दिया। तभी से यह परंपरा कायम हुई कि क्षत्रिय इस दिन शमी वृक्ष पर तीर चलाते हैं एवं उससे गिरे पत्तों को अपनी पगड़ी में ले लेते हैं।
ये हैं शस्त्र पूजा के शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार, दशमी तिथि 4 अक्टूबर, मंगलवार दोपहर 2.20 से 5 अक्टूबर, बुधवार दोपहर 12 बजे तक रहेगी। श्रवण नक्षत्र दशहरे पर पूरे दिन रहेगा। इस दिन के शुभ मुहूर्त इस प्रकार हैं-
सुबह 9.30 से दोपहर 12 बजे तक
दोपहर 2 से 2.50 तक
दोपहर 3 से शाम 6 बजे तक
दशहरे पर इस विधि से करें शस्त्र पूजा
- विजयादशमी की सुबह स्नान आदि करने के बाद एक स्थान पर सभी अस्त्र-शस्त्र किसी कपड़े के ऊपर व्यवस्थित तरीके से जमा दें।
- सबसे पहले शस्त्रों के ऊपर ऊपर जल छिड़क कर पवित्र करें। सभी अस्त्र-शस्त्रों पर मौली (पूजा का धागा) बांधे।
- इसके बाद महाकाली स्तोत्र का पाठ कर शस्त्रों पर कुंकुम, हल्दी का तिलक लगाकर हार पुष्पों से श्रृंगार कर धूप-दीप कर मीठा भोग लगाएं।
- पूजा करते समय इस मंत्र का का जाप करें- आश्विनस्य सिते पक्षे दशम्यां तारकोदये। स कालो विजयो ज्ञेयः सर्वकार्यार्थसिद्धये॥
- अंत में कुछ देर के लिए शस्त्रों का प्रयोग करें जैसे हवाई फायर। तलवार या अन्य कोई शस्त्र हो तो उसका प्रदर्शन करें।
- इस प्रकार दशहरे पर शस्त्र पूजा करने से शोक और भय का नाश होता है। साथ ही देवी विजया प्रसन्न होती हैं।
Published on:
05 Oct 2022 11:02 am
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