
इस शहर में आज भी रहते हैं ईमानदार लोग, पेश की एक से बढ़कर एक ईमानदारी की मिसाल
रायपुर। स्कूल टाइम पर आपने ऑनेस्टी इज बेस्ट पॉलिसी जरूर पढ़ा होगा। इस निबंध को पढ़ाने के पीछे तर्क यही है कि कम उम्र में ही आपको ईमानदारी का पाठ पढ़ा दिया जाए। हालांकि यह एक तरह का संस्कार है जो हमें घर से ही मिलता है। ईमानदारी एक बड़ी पूंजी है। ईमानदार लोग कम ही मिलते हैं। कोई मिल जाए तो लोग ऐसे व्यक्ति को सिर से पांव तक जरूर देखते हैं। 30 अप्रेल को ऑनेस्टी डे मनाया जाता है। आज हम कुछ ऐसे ईमानदार ऑटोचालकों से रूबरू करा रहे हैं जिन्होंने मिसाल कायम की है। उनकी बातचीत से यही सत्य सामने आया कि ईमानदारी कायम है इसलिए चल रही है दुनिया।
शांति के लिए जरूरी है लालच का त्याग
हीरापुर निवासी विजय जायसवाल ट्रक लाइन में थे। एक एक्सीडेंट के बाद एक पैर गंवाने के बाद ऑटो चला रहे हैं। उन्होंने बताया कि दो घटनाएं हुईं हैं। एक व्यक्ति एनआईटी के पास से रेलवे स्टेशन के लिए बैठा। स्टेशन से वापसी के दौरान मैंने देखा कि पीछे बैग पड़ा है। चूंकि बैग में आईडी थी जो सामने ही नजर आ रही थी। मैंने एड्रेस देख सरोना स्थित घर जाकर बैग लौटा दिया। दूसरी घटना में बैग को हमने टाटीबंद थाने में जमा कराया था। विजय कहते हैं कि जिंदगी सुकून से बिताने के लिए सिर्फ पैसे की जरूरत नहीं होती। शांति भी चाहिए और शांति के लिए जरूर है कि आपमें लालच का भाव न रहे।
किसी की चीज मैं रख लूं तो क्या अमीर हो जाऊंगा?
पांच साल से ऑटो चला रहे सुनील शुक्ला मोती नगर श्रद्धा विहार के रहने वाले हैं। कुछ दिन पहले दोपहर में भोजन करने घर आए तो देखा कि पीछे किसी का बैग रखा हुआ है। इसे लेकर वे महिला थाना गए। वहां से पुलिसवालोंं ने नंबर वगैरह देखकर बैग वाले को फोन किया। जिसका बैग था वह मैडम पाटन में जॉब करती है। वे मुझे बतौर इनाम रुपए भी दे रही थी लेकिन मैंने मना कर दिया। मैंने कहा कि आपका सामान मिल गया आपको खुशी है यही मेरे लिए बड़ी बात है। ठीक ऐसे ही मोतीनगर की एक महिला का बैग छुट गया था, चूंकि मैं उसे जानता था लेकिन घर का पता नहीं मालूम था। कुछ दिनों बाद जब वह मिली तो लौटा दिया। सुनील कहते हैं कि किसी की चीज मैं रख लूं तो क्या अमीर हो जाऊंगा? अपराधबोध की जिंदगी भला किस काम की।
फोन आया कि मैडम मिलना चाहती हैं, मैं सवारी में व्यस्त था
मोवा निवासी अब्दुल अजीज 4 साल से ऑटो चला रहे हैं। उन्होंने बताया कि पंडरी से राठौर चौक के लिए सवारी बैठी। इसके बाद मैंने घड़ी चौक के लिए सवारी बिठाई। उनमें से एक ने बताया कि किसी का बैग पीछे है। मैंने पंडरी ट्रेफिक पुलिस में बैग जमा कर दिया। जब उस बैग को लेने कोई मैडम आई तो थाने से फोन आया कि वे धन्यवाद ज्ञापित करने के लिए मिलना चाह रही हैं। चूंकि मैं सवारी लेकर कहीं और था तो मैंने कहा कि उन्हें उनकी चीज मिल गई, बस और क्या।
Published on:
30 Apr 2019 07:01 am
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