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World Tribal Day: आदिवासी आज भी मानते हैं प्रकृति को मां, न चलाते हैं खेतों में हल और न ही फसल नष्ट करने लगाते हैं आग

World Tribal Day: आदिवासी आज भी प्रकृति को सही मायनों में मां मानते है। ये न तो खेत में हल चलाते है और न ही फसल नष्ट करने आग लगाते हैं। कबीरधाम में ऐसे कई जनजातिय समूह निवास करते हैं जो आज भी प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है।

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World Tribal Day: कवर्धा। अब मनुष्य को भी समझ में आने लगा है कि उसने पर्यावरण का आवश्यकता से अधिक दोहन किया है। इस दोहन व शोषण के भाव में धरती पर एक समूह ऐसा भी है जो आज भी प्रकृति धरती को माता मानकर आवश्यक संसाधनों के साथ अपना जीवनयापन कर रहे है।

पंडरिया ब्लॉक के शिक्षक गोपी कृष्ण सोनी व धनीराम कधमिया ने आदिवासी व बैगा समुदाय पर अध्ययन किया है। अपने अध्ययन में इन्होंने पाया कि बोड़ला और पंडरिया ब्लाक के आदिवासी प्रकृति प्रेमी व पर्यावरण के सच्चे उपासक हैं। प्रकृति से अन्न व औषधि ग्रहण करते ही हैं। इसके चलते ही खेतों पर हल चलाकर उसे चोट नहीं पहुंचाते। न ही आग लगाकर फसलों को नष्ट करते हैं। यह प्रकृति से मिले सभी वस्तुओं का पूर्ण रूप से उपयोग करते हें। बदले में प्रकृति को पूरा जीवन समर्पित कर देते हैं।

जनजातिय समुदाय के जीवनचर्या से संबंधित अधिकतर वस्तुएं वनों से ही प्राप्त होती है। चाहे व खाने की सामग्री हो या फिर अन्य दैनिक उपयोग की। साथ ही वनाें से इन्हें प्रचुर मात्रा में जीवनदायिनी औषधियां भी प्राप्त होती है। जनजातीय समूह स्वयं ही चुनकर अपना उपचार करते हैं। सफेद मूसली, गिलोय, बनजीरा, हल्दी, हदमुडी, कुरकुट, पीपल, पाकड़, फ्लारा, गुल्लर, आक, जरिया आदि ऐसे पौधे व वृक्ष है जिससे जनजातिय समाज छोटी से लेकर बड़ी बीमारियों का इलाज करते हैं।

आदिवासी आज भी प्रकृति को सही मायनों में मां मानते है। ये न तो खेत में हल चलाते है और न ही फसल नष्ट करने आग लगाते हैं। कबीरधाम में ऐसे कई जनजातिय समूह निवास करते हैं जो आज भी प्रकृति और प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है। ये प्रकृति को मां मनाते है इसलिए धरती पर न हल चलाते है न ही फसलों को नष्ट करने के लिए आग लगाते हैं।

जंगल व जमीन का करते हैं संरक्षण
आदिवासी समुदाय धरती को मां के रूप में देखते हैं। उनका कहना है कि जिस प्रकार मां अपने पुत्रों का किसी भी परिस्थिति में पेट भरने और संरक्षण करती है। उसी प्रकार धरती माता भी उनके लिए अन्न व फल देती हैै जिससे पेट भरता है। वन में कोई भी व्यक्ति भूखा नहीं रह सकता है।

गोदना है प्रचलित
जनजातियों की प्राचीन परंपरा गोदना जनजाति समुदाय के जीवन की मुख्य क्रिया है। उनका मानना है कि मृत्यु के बाद भी यह चिन्ह उनके साथ रहता है। वही कुछ का मान्यता है कि यह चिन्ह मां बेटी को प्राप्त होता है। गोदना बबूल या जंग लगे सुइयां पारम्परिक उपकरण के गोदा जाता है। इससे उपजने वाले दर्द को कम करने के लिए इस पर मालवन वृक्ष का रस लगया जाता है।

बाघ को मानते है देवता
जिले के बैगाओं की बेवर खेती घने जंगलों में होती है जहां बाघ का खतरा हमेशा बना रहता है। इसलिए वे बाघ को देवता मानकर उसकी पूजा करते हैं। उनका मानना है इससे बाघ देवता खुश होते हैं। इसी तरह बैगा गांव की सीमाओं पर वन देवी की स्थापना करते हैं। एक स्थान पर पत्थरों का ढेर लगाकर बंजारिन माई को स्थापित किया जाता है।