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sawan somwar : एक लोटा जल से हो जाएगा 1008 शिवलिंग का अभिषेक, यकीन नहीं तो देखें वीडियो

सावन के महीने में आप भी एक लोटा जल से 1008 शिवलिंग के अभिषेक का फल प्राप्त कर सकते हैं।

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sawan somwar : एक लोटा जल से हो जाएगा 1008 शिवलिंग का अभिषेक, यकीन नहीं तो देखें वीडियो

sawan somwar : एक लोटा जल से हो जाएगा 1008 शिवलिंग का अभिषेक, यकीन नहीं तो देखें वीडियो

रायसेन. सावन का महीना भगवान भोलेनाथ का सबसे प्रिय महीना है, इस महीने में भगवान भोलेनाथ का अभिषेक करना विशेष फलदायी होता है, ऐसे में हम आपको मध्यप्रदेश में स्थित ऐसे शिव मंदिर के दर्शन करा रहे हैं, जहां महज एक लोटा जल से अभिषेक करने से 1008 शिवलिंग का अभिषेक हो जाता है, हम आपको इस मंदिर पर तक पहुंचने का रास्ता भी बता रहे हैं। माना जाता है इस शिव मंदिर में दर्शन मात्र से भक्तों की मनोकामना पूरी हो जाती है।

ये शिव मंदिर मध्यप्रदेश के रायसेन जिले में स्थित है, यहां सावन माह और शिवरात्रि में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ता है, ये मंदिर भोजपुर शिव मंदिर से करीब 8 किलोमीटर दूर औबेदुल्लागंज के रास्ते पर स्थित है, आप यहां बस, टैक्सी, बाइक और कार किसी भी साधन से पहुंच सकते हैं।

मध्यप्रदेश के रायसेन जिले के भोजपुर मंदिर के पास है आशापुरी गांव। इस गांव में खुदाई के दौरान ऐसा अनूठा शिवलिंग मिला था, जिसने सभी को हैरत में डाल दिया था। इस शिवलिंग में लोगों की आस्था बढ़ती गई और अब यह स्थान पवित्र धाम बन गया है। श्रद्धालुओं का मानना है कि एक शिवलिंग पर 1008 छोटे-छोटे शिवलिंग होने का फल जरूर मिलता है। आसपास के लोग इस भिलोटा देव भी कहते हैं। शिवलिंग के सामने ही नंदी व मां पार्वती की प्रतिमा भी स्थापित है।

महाशिवरात्रि पर होता है भक्तों का मेला

इस शिवालय के संजय महाराज नामक पुजारी कहते हैं कि महाशिवरात्रि पर यहां भक्तों का मेला लग जाता है। बड़ी संख्या में लोग इस अनूठे शिवलिंग के दर्शन करने आते हैं। यहां भंडारे और भजनकीर्तन के कार्यक्रम होते हैं।

भूतेश्वर महादेव भी है अनोखे

आशापुरी गांव में ही भूतेश्वर महादेव भी हैं जो चारों तरफ से खंडहर के बीच विराजमान हैं। परमारकालिन और बेशकीमती धरोहर के बीच इस स्थान पर जाने की मनाही है। पुरातत्व विभाग के संरक्षण में यह मंदिर है, जो खंडहर की शक्ल में है। वो इसे संरक्षित करने का प्रयास कर रहा है। इसके साथ ही आशापुरी में गांव से 300 मीटर की दूरी पर 9वीं से 12वीं सदी के बीच मंदिर समूह के अवशेष संरक्षित है।