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दम तोड़ रहा पीतल.कांसे का सदियों पुराना व्यापार

सस्ती धातुओं का बाजार पर कब्जा, बर्तनों की मरम्मत करने वाले कारीगर हुए बेरोजगार।पीतल.कांसे के दाम अधिक होने से मध्यम और गरीब वर्ग की पहुंच से दूर।

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दम तोड़ रहा पीतल.कांसे का सदियों पुराना व्यापार

दम तोड़ रहा पीतल.कांसे का सदियों पुराना व्यापार

रायसेन. जिले के नगर बेगमगंज सहित आसपास के क्षेत्र में पीतल कांसे का कारोबार अब दम तोड़ता नजर आने लगा है। जबकि यह कारोबार काफी पुराना रहा है मगर अब सस्ती कीमतों वाली सामग्री से बने बर्तन पीतल के स्थान पर उपयोग किए जाने लगे हंै। जिसके कारण कांसा और पीतल के बर्तनों में टूट-फूट की सुधार करने वाले कारीगर भी बेरोजगार हो गए। किसी समय में क्षेत्र को पीतल.कांसे के बर्तनों की पूर्ति करने वाले वर्तमान में सिर्फ कारीगर बचे हैं। मंहगाई की मार के साथ इन्हें अन्य किसी योजना का लाभ नहीं मिल सका। पहले शादियों के समय इन बर्तनों की बहुत मांग हुआ करती थी। लेकिन अब वह भी कम हो चली है, क्योंकि स्टील सहित अन्य सस्ती धातुओं के बर्तनों ने इसका स्थान ले लिया है।
कारीगर हो गए बेरोजगार
व्यापारी सुरेश ताम्रकार इस बारे में बताते हैं कि परंपरा का निर्वाह करने के लिए ही लोग कांसे के बर्तन खरीदते हैं। थोड़ा बहुत पीतल के बर्तन भी खरीदे जाते हैं। इनकी मरम्मत करने वाले कारीगरों की भी कमी है। अधिकतर लोग अब पीतल वेल्डिंग से काम चला लेते हैं। वर्तमान में पीतल लगभग 70 हजार रुपए क्विंटल मिल रहा है।
शादी की रस्म अदायगी के लिए कांसे के बेलन.थाली की पहले बहुत डिमांड हुआ करती थी, अब कम हो गई है। दीपू ताम्रकार बताते हैं कि कांसा अब 1500 रुपए किलो हो गया। कांसे का बाजार भी नहीं बचा है। थोक में यह 1500 रुपए किलो जाता है। यदि अभी भी इन धातुओं का उपयोग किया जाए तो स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है।
परंपरा या शादियों में करते उपयोग
आयुर्वेद में चिकित्सक द्वारा परामर्श दिए जाने पर ही कुछ लोग तांबा और कांसे के बर्तन उपयोग के लिए लेते हैं। या फिर शादियों में परंपरा का निर्वाह करने के लिए। कारीगरों ने तांबा, पीतल और कांसे के डिजाइन वाले बर्तन बनाना भी शुरु कर दिए हैं, जो देखने में भी खूबसूरत लगते हैं। लेकिन उसे मध्यम व गरीब वर्ग के लोग नहीं खरीद पाते, पूंजीपति लोग ही उनका उपयोग कर रहे हैं। यदि सरकार उक्त धातुओं की कीमतें कम कर दे तो प्राचीन परंपरा अनुसार पीतल-कांसा के बर्तन लोग सस्ता होने से उपयोग करने लगेंगे।
इनका कहना
हम तो सिर्फ कारीगर हैं, लागत ज्यादा होने से काम बंद होने लगा है। स्टील के बर्तनों ने इस धंधे की कमर तोड़ दी। अगर सरकारी सुविधा मिले तो काम बढ़ सकता है। मजबूरी है इसलिए करना पड़ता है। हम पुराने बर्तन ठीक करते और नए विक्रय भी करते हैं।
रजनीश ताम्रकार, कारीगर।