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छल कपट रखने वाले को भगवान स्वीकार नहीं करते

भगवान शिव के लिए प्रिय वह हैं, जो व्यक्ति निर्मल मन वाले हैं, सज्जन हैं, आत्म संयमी हैं

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God does not accept deceitful people

Silvani Addressing the Vyaspeeth in the Shringing Puran Katha organized by the management at Laxmi Narayan Temple in Saikhekha village of Tehsil, Acharya Dr. Ramadar Upadhyay said that 'those who are pure in heart, achieve their achievement and Lord Shiva is on them They are very happy.

सिलवानी. तहसील के साईंखेड़ा गांव स्थित लक्ष्मी नारायण मंदिर में प्रबंधन द्वारा आयोजित श्रीलिंग पुराण कथा में व्यासपीठ से संबोधित करते हुए आचार्य डॉ. रामाधार उपाध्याय ने कहा कि 'जिन मनुष्यों का अंत: करण शुद्ध है, उनको ही सिद्धि प्राप्त होती है और भगवान शिव उन पर सहज ही कृपा कर देते हैं।

भगवान शिव के लिए प्रिय वह हैं, जो व्यक्ति निर्मल मन वाले हैं, सज्जन हैं, आत्म संयमी हैं, सत्पुरुष हैं और सदाचारी हैं, जिनके मन में दया, करुणा और मानव मात्र को सहयोग की भावना विद्यमान है, जो व्यक्ति तपस्या में स्वयं को लगाए हुए हैं, भगवान की शरण में जिन्होंने स्वयं को समर्पित कर दिया है। जिन व्यक्तियों ने अधर्म का त्याग कर अपने जीवन में अहिंसा और शांति का समावेश कर लिया है और इसको अपने जीवन में उतार कर जगत कल्याण के लिए तत्पर हैं।

डॉ. उपाध्याय ने बताया कि शिव पुराण की कथा के माध्यम से हम भगवान शिव के समग्र स्वरूप को जान पाते हैं। भगवान शिव का जो शिवलिंग है वह संपूर्ण ब्रह्मांड को दर्शाने वाला एक परम पवित्र प्रतीक है। जिसकी पूजन करने से संपूर्ण ब्रह्मांड का अर्चन हो जाता है और शिवलिंग सृजन का भी प्रतीक हैै।

शिव तत्व की महानतम व्याख्या भगवान ब्रह्मा ने की है कि शिव तत्व परम पवित्र, अद्भुुत, उत्कृष्ट और आत्मा को परमात्मा से मिलाने का प्रभावी माध्यम होने के साथण्साथ अमरत्व प्रदान कर जीव को जन्म मरण के चक्र से मुक्ति देने का प्रभावी माध्यम है। कथा वाचक ने कहा कि व्यवहारिक जी,न में शुद्धि का बहुत महत्व है जो व्यक्ति बाहर से जैसा दिखाई देता है, आंतरिक व्यक्तित्व से भी उसे परम पवित्र होना चाहिए। निर्मल मन वाले व्यक्ति को ही भगवान स्वीकार करते हैं।

छल कपट वाले व्यक्ति को भगवान स्वीकार नहीं करते। इसीलिए गोस्वामी तुलसीदास ने भी रामचरित मानस में कहा है कि निर्मल मन जन सो मोहि पावा, मोहि कपट छल छिद्र न भावा। आशय है कि स्वयं के व्यक्तित्व को जानकर पूर्ण सदाचार से सद व्यवहार से जीवन जीते हुए शिव तत्व को जानकर अपनी आत्मा में शिव को समाहित करने की पुराण की कथा में हमें प्राप्त होती है।