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पंच कुंडीय श्रीराम महायज्ञ: भारतीय संस्कृति का प्रमुख अंग है यज्ञ

कलशारोहण के साथ श्रीराम महायज्ञ का समापन, हुआ भंडारे का आयोजन

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कलशारोहण के साथ श्रीराम महायज्ञ का समापन, हुआ भंडारे का आयोजन

पंच कुंडीय श्रीराम महायज्ञ: भारतीय संस्कृति का प्रमुख अंग है यज्ञ

सिलवानी. नगर के प्राचीन श्रीराम जानकी मंदिर जमुनियापुरा में पंच कुंडीय श्रीराम महायज्ञ का पूर्णाहुति एवं कलशारोहण के साथ समापन हुआ। पूर्णाहुति में पूर्व विधायक देवेंद्र पटेल शामिल हुए और उन्होंने ब्राह्मणों से आशीर्वाद प्राप्त किया। श्री पंच कुंडीय श्रीराम महायज्ञ एवं कलशारोहण का आयोजन यज्ञाचार्य नगर खेड़ापति पंडित संजय शास्त्री के आचार्यत्व में ब्राह्मणों ने सम्पन्न कराया। पंडित संजय शास्त्री ने यज्ञ की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि यज्ञ भारतीय संस्कृति का प्रमुख अंग है। सनातन धर्म में प्रतिदिन यज्ञ करने की बात कही गई है। वर्तमान समय में समयाभाव के कारण यह संभव नहीं है, लेकिन जीवन में प्रत्येक सनातन प्रेमी को यज्ञ में प्रतिवर्ष सम्मिलित होना ही चाहिए, क्योंकि यज्ञ से श्रेष्ठ कोई दूसरा धर्म नहीं है। यज्ञ में दान करने से धन पवित्र होता है। यज्ञ में श्रम करने से तन पवित्र होता है। यज्ञ में आहुति देने से मन पवित्र होता है। यज्ञनारायण की परिक्रमा करने से तीर्थों से दर्शन का पुण्य प्राप्त होता है।

उन्होंने कहा कि यज्ञ में समस्त देवताओं का आह्वान किया गया और यज्ञ सदैव विश्व कल्याण की भावना से किया जाता है। यज्ञ सम्पूर्ण संपूर्ण प्राणियों को भौतिक, सांसारिक, आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करता है। इस कारण यज्ञ नारायण भगवान मैं पूर्ण श्रद्धा होना चाहिए। समापन दिवस पर पंडित भूपेन्द शास्त्री ने यज्ञ के महत्व को बताते हुए कहा कि कलयुग में सम्पूर्ण राष्ट्र के कल्याण का साधन मात्र यज्ञ ही है। यज्ञ से सम्पूर्ण जीव जन्तु एवं प्राणियों का हित सुनिश्चित है। पूर्णाहुति के अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालुजन उपस्थित रहे। इसी के साथ श्रीराम मंदिर के नवनिर्मित शिखर पर पीतल का कलश एवं ध्वज चढ़ाया और आरती की गई। इसके बाद कन्या भोज, ब्राह्मण भोज कराया और भंडारा किया गया। श्रीराम मंदिर के महंत नागा रामदास महाराज ने यज्ञ के सफल आयोजन पर समस्त श्रद्धालुओं को आशीर्वाद देते हुए कृतज्ञता प्रकट की है।

देव स्थान का निर्माण कराने से खुलते हैं मोक्ष के द्वार
बरेली. बरेली के निकट ग्राम महेश्वर में नवनिर्मित श्री राममंदिर प्राण प्रतिष्ठा अनुष्ठान के उपलक्ष्य आयोजित श्रीरामकथा की पूर्णाहुति रविवार को हुई। इस अवसर पर कथा व्यास ब्रह्मचारी महाराज ने बताया कि देवस्थान का निर्माण कराना सबसे बड़ा पूर्थ पुण्यकार्य है। मंदिर निर्माण कराने से मिलने वाले पुण्य कर्म से मोक्ष के द्वार खुलते हैं। ब्रह्मचारी महाराज ने बताया की कर्म के दो प्रकार होते हैं। ईष्ट कर्म और पूर्थ कर्म। वांछित मनोकामना या कर्तव्य पूर्ति के लिए किए जाने कर्म ईष्ट कहलाते हैं।

ईष्ट कर्म से बंधन मुक्त नहीं होते। बिना किसी कामना से किए जाने वाले कर्म पूर्थ कर्म कहलाते हैं। सार्वजनिक जल स्रोत जैसे कुआं, तालाब खुदवाना, प्याऊ लगवाना, अन्न दान के सदाव्रत लगवाना, देव स्थान का निर्माण, नर्मदा किनारे धर्मशाला आदि का निर्माण कराना पूर्थ कर्म कहलाते हैं। पूर्थ कर्म, बंधन से मुक्त करने वाले कर्म होते हैं। सभी पुण्य कर्मों से सीधे मोक्ष के द्वार खुलते हैं। देवस्थान का निर्माण कराना सबसे बड़ा पुण्य कर्म है। मंदिर निर्माण कराने से मोक्ष प्राप्त होता है।