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डोंगरगढ़ व खैरागढ़ के जंगलों में 35 स्तनधारी जीव और पक्षियों की 290 प्रजातियों की पहचान, शोध में हुआ खुलासा

CG News: यहां के जंगलों में अनगिनत दुर्लभ और संरक्षित वन्य प्रजातियों का बसेरा है। शोधकर्ताओं की माने तो पक्षियों की यहां 290 प्रजातियां पाई जाती हैं

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CG News: छत्तीसगढ़ के डोंगरगढ़ और खैरागढ़ नाम के दोनों (गढ़) केवल ऐतिहासिक व सांस्कृतिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि अपनी समृद्ध जैव विविधता के लिए भी जाने जाते हैं। यहां के जंगलों में अनगिनत दुर्लभ और संरक्षित वन्य प्रजातियों का बसेरा है। शोधकर्ताओं की माने तो पक्षियों की यहां 290 प्रजातियां पाई जाती हैं। हाल ही में हुए एक विस्तृत अध्ययन ने इस क्षेत्र की वन्यजीव समृद्ध संपदा को उजागर किया है। जिससे यह स्पष्ट होता है कि यदि सही दिशा में प्रयास किए जाएं, तो यह इलाका जैव विविधता संरक्षण का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।

CG News: शोध में 35 स्तनधारी प्रजातियों की पहचान

हाल ही में एबियंट साइंस नामक वैज्ञानिक जर्नल में प्रकाशित एक शोध में यहां की अद्भुत जैव विविधता देखने को मिली है। इस अध्ययन में कुल 35 स्तनधारी प्रजातियों की पहचान की गई। जिनमें कई दुर्लभ और संकटग्रस्त प्रजातियां शामिल हैं। बाघ, तेंदुआ और भारतीय पैंगोलिन जैसे वन्यजीवों की मौजूदगी खैरागढ़ और डोंगरगढ़ के जंगलों में दर्ज की गई है, जबकि खतरों में शामिल कुछ प्रजातियां जैसे भालू और चौसिंघा यहां नियमित रूप से पाए जाते हैं। अध्ययन के दौरान कई ऐसे रोमांचक क्षण आए जब शोधकर्ताओं ने दुर्लभ जीवों की गतिविधियों को नजदीक से देखा।

नवेगांव टाइगर रिजर्व से जुडे हुए हैं…

उन्होंने बताया कि यहाँ के जंगल कान्हा नेशनल पार्क, भोरमदेव अभयारण्य और नवेगांव टाइगर रिजर्व से जुडे़ हुए हैं। ऐसे में इस विशाल वन क्षेत्र और समृद्ध जैव विविधता को संरक्षित कर इसे मध्यभारत में चल रहे वन्यजीव संरक्षण कार्य को बल मिल सकता है। डोंगरगढ़ और खैरागढ़ दोनों पहले ही पर्यटन स्थल के रूप में विकसित और वियात हैं,अगर यहां के जंगलों को संरक्षित कर "सामुदायिक संरक्षण रिजर्व" घोषित किया जाए तो पर्यटन का और भी अधिक महत्व बढ़ जाएगा।

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इससे न केवल वन्यजीवों को सुरक्षित आवास मिलेगा,बल्कि स्थानीय समुदायों को भी संरक्षण में शामिल किया जा सकेगा। स्थानीय प्रशासन और ग्रामीण मिलकर काम करें, तो यह क्षेत्र छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख वन्यजीव संरक्षित क्षेत्र बन सकता है। डोंगरगढ़ और खैरागढ़ की इन हरी-भरी वादियों में अब भी उमीद बाकी है। यदि समय रहते ठोस कदम उठाए जाएं, तो यह इलाका आने वाली पीढ़ियों के लिए एक समृद्ध जैव विविधता धरोहर के रूप में सुरक्षित रह सकता है।

जंगल में बाघों की उपस्थिति के प्रमाण 2020 से आज तक मिल रहे हैं

इस शोध में प्रकृति शोध व संरक्षण वेलफेयर सोसाइटी के प्रतीक ठाकुर और डॉ. दानेश सिन्हा के साथ छत्तीसगढ़ के मशहूर ऑर्निथोलॉजिस्ट एएम के भरोस और पक्षी प्रेमी और वर्तमान में सीईओ जिला पंचायत कोंडागांव में पदस्थ अविनाश भोई शामिल रहे। शोधकर्ताओं ने बताया यहाँ के जंगलों में बाघों की उपस्थिति के प्रमाण 2020 से आज तक मिल रहे हैं। बाघ के यहा स्थाई निवास के दावे भी किए जा रहे हैं। इस पर गहन अध्ययन की जरूरत है। इस इलाके की वन्य जीव संपदा जितनी अद्भुत है, उतनी ही चुनौतियों से भी घिरी हुई है।

जंगलों का कटाव, खेती का बढ़ता दायरा और अवैध शिकार जैसी समस्याएं इन जीवों के अस्तित्व के लिए खतरा बन रही हैं। स्लॉथ बियर,पेंगोलिन (शाल खपरी),हिरण और तेंदुए जैसी प्रजातियों के साथ मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं बढ़ रही हैं। ग्रामीणों के बीच कई अंधविश्वास भी प्रचलित हैं, जिसके कारण कई बार वन्यजीवों का शिकार किया जाता है। उदाहरण के लिए, पैंगोलिन की स्केल और तेंदुए के दाँत और नाखूनों की तस्करी बढ़ती जा रही है, जिससे इनकी आबादी खतरे में पड़ गई है।