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धार्मिक सद्भाव: इस मजार में हिन्दू खादिम सालों से कर रहे सेवा, हर धर्म के लोग करते हैं इबादत

राजनांदगांव का एक मजार पिछले 35 सालों से सामाजिक सौहाद्र का उदाहरण पेश कर रहा है। इस मजार के मुजावर (खादिम) हिन्दू हैं और उनका नाम है, राजेश तिवारी।

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राजनांदगांव. अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाए जाने की घटना को कल बुधवार को 25 साल हो गए। इन 25 सालों में देश ने कई शहरों और राज्यों में धार्मिक उन्माद का माहौल देखा है, लेकिन करीब ४ सौ सालों से भी ज्यादा समय से लोगों की आस्था का केन्द्र बना राजनांदगांव का एक मजार पिछले 35 सालों से सामाजिक सौहाद्र का उदाहरण पेश कर रहा है। इस मजार के मुजावर (खादिम) हिन्दू हैं और उनका नाम है, राजेश तिवारी।

राजनांदगांव के वर्तमान गंज चौक के पास स्थित मामा भांजा मजार में तिवारी ३५ सालों से खादिम का काम कर रहे हैं। हर दिन शाम के वक्त यहां आकर मजार में अपनी मुरादें लेकर आने वाले लोगों को इबादत कराने का काम ये कर रहे हंै। उनके अलावा एक और खादिम मोहम्मद कासिम झाड़ोतिया भी यहां खिदमत के लिए हैं।

उनको यहां ४० साल से ज्यादा का समय सेवा करते हो गए हैं। राजेश बताते हैं कि वे जब छोटे थे तो मामा भांजा मजार में पानी भरने का काम करते थे। कुछ सेवा कर देते थे, फिर अचानक मन यहीं रम गया और पिछले कई सालों से यह सिलसिला चल ही रहा है।

मामा भांजा मजार की यह कहानी पता चली है कि करीब ४ सौ साल पहले रजवाड़े के समय एक मामा और उनके भांजे राजा के सिपहसलार थे। उस वक्त मोहला मानपुर रियासत ने राजनांदगांव रियासत पर हमला कर दिया था। अपनी रियासत को बचाने की कोशिश में इसी जगह में मामा और भांजा ने शहादत दी थी। उस वक्त यह जगह वीरान और जंगल जैसा था। इसके बाद एक ही जगह मामा और भांजा का मजार बनाया गया। तब से यह आस्था का केन्द्र बना हुआ है।

सद्भावना होनी चाहिए
अयोध्या में बरसों से चल रहे विवाद पर तिवारी कहते हैं कि ये सब राजनीतिक लोगों की बातें हैं। वे कहते हैं कि वे अपनी राजनीतिक रोटी सेंक रहे हैं और लोगों को बरगला रहे हैं। उनके मुताबिक सभी धर्म का एक ही मूल है और वो है, सद्भावना। सबको सभी धर्मों का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने कहा कि वे हिन्दू हैं, लेकिन कभी उनके इस मजार में खादिम होने से कोई दिक्कत न उनके परिवार को हुई और न ही मुस्लिम समाज को इससे परेशानी है।

मन्नत मांग लगाते हैं ताला
मजार में सभी धर्म के लोगों की आस्था है। यहां लोग अपनी मन्नत लेकर आते हैं। मन्नत के लिए यहां पर रेलिंग में ताला लगाकर जाते हैं। मन्नत पूरी होने पर ताला खोलने आते हैं। हर दिन यहां दर्जन भर से ज्यादा ताले लगाए जाते हैं। चारों ओर ताले ही ताले नजर आते हैं। खादिम तिवारी बताते हैं कि मन्नत पूरी होने पर लोग ताले खोलते हैं और उसे विसर्जित कर दिया जाता है।