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डोंगरगढ़ वासियों ने आचार्य विद्यासागर का अवतरण दिवस धूमधाम से मनाया

चंद्रगिरी स्थित प्रतिभास्थली में हुए विभिन्न आयोजन

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कार्यक्रम... आचार्य के ७३वें अवतरण दिवस पर हुए विभिन्न आयोजन।

राजनांदगांव / डोंगरगढ़. समीपस्थ ग्राम राजकट्टा में स्थित चंद्रगिरी तीर्थ क्षेत्र में जैन मुनि आचार्य विद्यासागर का 73वां अवतरण दिवस धूमधाम से मनाया गया। इस अवसर पर प्रतिभास्थली में सुबह अभिषेक हुआ शांतिधारा के साथ सामूहिक पूजन भी किया गया। पूजन विधान के साथ-साथ आचार्य की भक्ति बच्चों ने की। चंद्रगिरी तीर्थ क्षेत्र में स्थित हथकरघा एवं वहां चल रहे विभिन्न निर्माण कार्यों में कार्यरत सभी कर्मचारियों को खीरपुरी का वितरण भी किया गया। दोपहर में बच्चों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। गुरु गाथा के नाम से आयोजित इस कार्यक्रम को भव्य रूप दिया गया। गुरुजी की महिमा का बखान प्रतिभास्थली में कार्यरत दीदीयों ने बखूबी से किया। रात्रि में आरती भी की गई। बड़ी संख्या में जैन संप्रदाय के लोगों ने अपने गुरु भगवन विद्यासागर महाराज के अवतरण दिवस पर विभिन्न कार्यक्रमों में शामिल होकर दिन भर व्यतीत किया। बच्चों ने सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लेकर संत के जीवन दर्शन की महिमा का गुणगान किया। कार्यक्रम में चंद्रगिरी चंद्रगिरी तीर्थ क्षेत्र के अध्यक्ष किशोर जैन, जैन समाज के अध्यक्ष सुभाष जैन, प्रतिभास्थली के मंत्री सप्रेम जैन सहित बड़ी संख्या में समाज के लोग उपस्थित थे।

आचार्य का पूर्व नाम विद्याधर था
बताया गया कि भारत भूमि के प्रखर तपस्वी चिंतक कठोर साधक गौरक्षक लेखक महाकवि राष्ट्रहित चिंतक आचार्य श्री का आज जन्म कर्नाटक के बेलगांम जिले के ग्राम चिक्कोड़ी में आश्विन शुक्ल पूर्णिमा शरद पूर्णिमा 10 अक्टूबर 1946 विक्रम संवत 2003 को हुआ था। आपका पूर्व का नाम विद्याधर था। आपको आचार्य श्रेष्ठ महाकवि ज्ञानसागरजी महाराज का शिष्यत्व पाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था। आपके द्वारा रचित संसार में सर्वाधिक चर्चित काव्य प्रतिभा की चरम प्रस्तुति है मूकमाटी महाकाव्य जिसके ऊपर मूकमाटी मीमांसा भाग 1 2 3 लगभग 283 हिंदी विद्वानों ने समीक्षाएं लिखी है जो भारतीय ज्ञान पीठ से प्रकाशित हो चुकी है इस पर 4 डीलिट् 50 पीएचडी 8 एमफिल 2 एमएड तथा 6 एमए आदि हो चुके है मूक माटी का मराठी अंग्रेजी बंगला कन्नड़ गुजराती उर्दू संस्कृत ब्राम्ही लिपि आदि में अनुवाद हुए हैं और हो रहे हैं। आचार्यश्री की प्रेरणा से उनके परिवार के ६ सदस्यों ने भी जैन साधु के योग्य संन्यास ग्रहण किया। उनके मातापिता के अतिरिक्त दो छोटी बहनों व दो भाइयों ने भी आर्यिका एवं मुनिदीक्षा धारण की।