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महिला दिवस विशेष: इशारों से मूक बधिर बच्चों की जीवन में ला रही ज्ञान का उजियारा

१०-१५ से बच्चे शासकीय जॉब भी कर रहे हैं, तो सैंकड़ों बच्चे बने आत्मनिर्भर

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महिला दिवस विशेष: इशारों से मूक बधिर बच्चों की जीवन में ला रही ज्ञान का उजियारा

महिला दिवस विशेष: इशारों से मूक बधिर बच्चों की जीवन में ला रही ज्ञान का उजियारा

गोविंद साहू @ राजनांदगांव . एक शिक्षक बच्चों को सिखाता है, लेकिन जब कोई शिक्षक बच्चों से सीख लेकर शिक्षिका बनीं हो तो थोड़ा अटपटा लगता है, लेकिन ये सच है। विश्व महिला दिवस पर हम आपको शहर में संचालित आस्था मूक बधिर स्कूल के एक ऐसी ही शिक्षिका पदमा साहू से रूबरू करा रहे हैं, जिन्हें स्कूल पहुुंचने से पहले मालूम नहीं था कि उन्हें बोलकर नहीं बल्कि बच्चों को इशारों में पढ़ाना है। पहले तो उन्हें उन बच्चों से ही सीखना पड़ा। बाद भिलाई में प्रशिक्षण लेकर पिछले १७ सालों से वे श्रवण व मूक बधिर बच्चों के ज्ञान चक्शु को इशारों से जागृत कर रही हैं। उनके पढ़ाए करीब १०-१५ से बच्चे शासकीय जॉब भी कर रहे हैं, तो सैंकड़ों बच्चे आत्मनिर्भर बन चुके हैं।


डोंगरगांव रोड पर विनोद धर्मकांटा के पास १९९७ से आस्था मूकबधिर स्कूल संचालित है, जहां श्रवण व मूक बधिर बच्चों को पहली से आठवीं तक नि:शुल्क शिक्षा दिया जाता है। वर्तमान में यहां ८९ स्टूडेंट अध्ययनरत हैं। यहां ऐसे बच्चों को सिर्फ शब्द ज्ञान ही नहीं बल्कि उन्हें खेल, संगीत, सिलाई-कढ़ाई सहित अन्य रोजगार मूलक शिक्षा दी जाती है।

पदमा साहू बतातीं है कि २००३ में वें बीकॉम फस्र्ट ईयर में थी, उन्हें जॉब की आवश्यकता थी, तभी आस्था मूक बधिर में शिक्षक की आवश्यकता के विज्ञापन पर उनकी नजर पड़ी। उन्होंने इंटरव्यू दिया। उनका सिलेक्शन हो गया। तब उन्हें मालूम नहीं था कि उन्हें बच्चों के आव-भाव व बॉडी लेंग्वेज को समझना है और इसी तरह उन्हें समझाना है। यह बेहद कठिन था, लेकिन ठान लिया कि अब उन्हें इन्हीं बच्चों को पढ़ाना है। २००५ में शादी हो गई। इसी दौरान उन्हें मूक बधिर बच्चों को पढ़ाने के लिए भिलाई स्थित प्रयास श्रवण विकलांग संस्थान से प्रशिक्षण लेना था, तो पति लोकेश साहू ने भी पत्नी का सहयोग किया। इसके बाद वह इस विधा में प्रशिक्षित हो गईं।

पीडि़तों का न्याय दिलाने में भी करती हैं मदद


शिक्षिका पदमा साहू न्याय पीठ में मदद करती हैं। किसी भी केस में पीडि़त, आरोपी या गवाह मूक बधिर होता है, तो उनके इशारों को समझकर कोर्ट को बताने के लिए प्रशिक्षित शिक्षिका साहू को बुलाया जाता है। वें बताती है कि अब तक इस तरह के १५ केस में मदद कर चुकी हैं।

पालकों से ज्यादा समझती है बच्चों की भावनाओं को


शिक्षिका साहू बताती हैं कि ऐसे बच्चों में पेंटिंग, चित्रकारी व रंगोली आदि करने का बहुत शौक होता है। ये अपनी बातों या भावनाओं इसी में उकरेते हैं। उन्होंने बताया कि एक बार एक बच्चे का जन्मदिन था, वह घर से आते समय अपनी मां से इशारों में कह रहा था कि उसे अपने स्कूल में शिक्षक व साथियों को चाकलेट बांटना है, लेकिन मां नहीं समझ पाई। स्कूल आते ही शिक्षक साहू को बताया, तब उन्होंने उसे बताया कि वह अपने जन्मदिन पर चाकलेट बांटना चाहता है। इसी तरह कई बार छुट्टियों में जब बच्चे घर में होते हैं, तो पालकों का फोन आता है बच्चा इस तरह का इशारा कर है, तो उन्हें बच्चों के इशारों के बारे में बताया जाता है।

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