
राजमसंद के बाल कृष्ण स्टेडियम में कवि सम्मेलन में प्रस्तुति देते कवि सुरेन्द्र शर्मा व मंचस्थ कवि।
राजसमंद. नगर परिषद और पर्यटन विभाग की ओर से गणगौर महोत्सव और मेले में अंतिम दिन गुलाबी गणगौर पर मेला मंच पर विराट कवि सम्मेलन आयोजित किया गया। इसमें कवियों ने राजनीति, परिवार से लेकर सामाजिक स्थितियों और समसामायिक विषयों पर एक से बढ़कर एक बेहतरीन रचनाएं पढ़ते हुए न सिर्फ काव्य रसिकों को सुबह चार बजे तक बांधे रखा, बल्कि देश, दुनिया, परिवार, समाज और युवा पीढ़ी की वर्तमान हालातों को लेकर सोचने पर भी मजबूर कर दिया।
कार्यक्रम की शुरुआत राजस्थान की प्रसिद्ध लोक नर्तकी गुलाबों ने रीमिक्स राजस्थानी गीतों पर बेहतरीन नृत्य की प्रस्तुतियां देकर मेलार्थियों का भरपूर मनोरंजन किया। इसके बाद कवि सम्मेलन का शुभारंभ मथुरा से आई कवयित्री पूनम वर्मा ने मां शारदे की वंदना प्रस्तुत करके की।
चित्तौडगढ़़ के कवि सोहनलाल चौधरी ने अरर पन्ना काली वा अंधियारी माझल रात, कविता पढ़ी तो पाण्डाल में महाराणा प्रताप और मेवाड़ धरा के खूब जयकारे लगे। अगली कड़ी में मध्यप्रदेश के मंदासौर से आए रचनाकार मुन्ना बैटरी ने कोविड महामारी के चलते देशभर में लगे लॉकडाउन को याद करते हुए बात कुछ ऐसी कहें कि लॉकडाउन का असर कुछ इस कदर पड़ गया जिंदगी पर कि पौछा लगाने से पराठा बनाने तक सीख गए। उन्होंने कहा कि इंसाफ नहीं मिलेगा यहां लिखने से मोबाइल में बलात्कारियों को निपटा दो हैदाराबादी स्टाइल में पेश कर महिला अपराधों े प्रति अपने आक्रोश का इजहार किया।
स्थानीय कवि गौरव पालीवाल ने गीत रसिक रसखान वारो, बांसुरी बजाने वारो गीत के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण की वंदना की। मुंबई से आई कवयित्री प्रेरणा ठाकरे ने मैं ही हाड़ी रानी मैं ही जीणमाता हूं, भारत की बेटी हूं हर जंग जीतना आता है... सुनाकर महिलाओं और बहन-बेटियों में जोश भरने का प्रयास किया। इंदौर से आए कवि अतुल ज्वाला ने अपनी रचना खुद्दारी से जीना राजस्थान सिखाता है, इस मिट्टी के कण-कण में राणा प्रताप दिखाई देते हंै.. सुनाकर किया। स्थानीय कवि सुनील व्यास ने सुख में से दुख से निकलने का मंत्र सिखाया और पैराडियों से भरपूर गुदगुदाया। साथ ही कच्चा घर, कच्चा आंगन पूरी जिन्दगी मां ने इसमें गुजार दी मुझे पक्का घर दिलाने के लिए, रचना पढकऱ श्रोताओं को बच्चों के लिए माता-पिता कितने दुख सहते हैं इससे अवगत कराया। कवयित्री पूनम वर्मा ने गीत किसी की याद की खुशबू में भीगे केश लाई हूं दिलों को जोडऩे वाले अमिट उपदेश लाई हूं, कभी कान्हां के होठों पर सजी रहती थी जो कुलमें मैं ब्रज की बांसुरी हूं प्रेम का संदेश लाई हूं... गीत प्रस्तुति किया। कार्यक्रम में कलक्टर नीलाभ सक्सेना, पुलिस अधीक्षक सुधीर चौधरी, कांग्रेस कमेटी के जिलाध्यक्ष देवकीनंदन गुर्जर, उपखंड अधिकारी नाथद्वारा अभिषेक गोयल, नगर परिषद सभापति अशोक टांक, जे.के. टायर के अनिल मिश्रा, मंदिर अधिकारी भगवती लाल पालीवाल सहित कई जनप्रतिनिधि और आमजन मौजूद रहे। संचालन दिनेश श्रीमाली व चावली चौधरी ने किया।
'अब भी मुझे लगती बुढिय़ा बहुत हसीन... पदम अलबेला
अगली कड़ी में सम्मेलन के सबसे वरिष्ठतम कवि 84 साल के पदम अलबेला ने रचना क्या सोचते हो मुझ में कॉन्फिडेंस नहीं, बुढ़ापे न जाओ कभी मन बूढ़ा नहीं होता, के माध्यम से जीवन की संाझ के समय को भी पूरे मन से जीने की प्रेरणा श्रोताओं को दी। इसके साथ ही उन्होंने अब भी मुझे लगती बुढिय़ा बहुत हसीन और उसका नाम चमेली सब कहते अलबेली, क्या दिखलाती तुझको घण्टी वाला सीन, रचना के माध्यम से पति-पत्नी के रिश्ते को उम्र के अंतिम पड़ाव में भी किस तरह जीवंत रखा जा सकता है अपने विशेष अंदाज से प्रस्तुति दी। कोटा से आए बुद्धि प्रकाश दाधीच ने लॉकडाउन के चलते बदली चीजों की स्थितियों को भी अपने अंदाज में प्रस्तुत करते हुए दर्शकों भरपूर हंसाया। ब्याईजी-ब्याणजी की कविता से श्रोताओं को गुदगुदाया।
'पहले हम दीवारों के बीच रहते थे, अब हमारे बीच दीवारें आ...Ó सुरेन्द्र शर्मा
सम्मेलन के अंत में प्रसिद्ध कवि सुरेन्द्र शर्मा ने पहले हम दीवारों के बीच रहते थे और अब हमारे बीच दीवारें आ गईं, सुनाकर देश और समाज की वर्तमान हालातों पर कटाक्ष किया। धर्म और राजनीति पर भी अपने अंदाज में बात करते हुए सोचने पर मजबूर कर दिया। इसके साथ ही पारिवारिक रिश्तों पर भी बेहतरीन अंदाज में रचनाएं पढ़कर श्रोताओं को विचार करने पर मजबूर कर दिया।
'काम ऐसा हो, जिसमें का न हो... सपंत सरल
व्यंग्यकार जयपुर के संपत सरल ने सबका प्रयास रहता है कि काम ऐसा हो, जिसमें का न हो, गीत पेश करके आज के लोगों की नौकरी के प्रति सोच पर तीखा कटाक्ष किया। उन्होंने समसामायिक एवं राजनीति से जुड़े विषयों पर भी पैरोडियों के माध्यम से व्यंग्य किया। उन्होंने बाजार और बाजारवाद की व्याख्या करते हुए आज के बाजारी युग पर कटाक्ष किया।
'गुजरी है जिदंगी ऐसे मुकाम से...Ó बलवंत बल्लू
ऋषभदेव के रचनाकार बलवंत बल्लू ने गुजरी है जिन्दगी ऐसे मुकाम से अपने ही पराए लगने लगे, रचना के माध्यम से वर्तमान दौर के रिश्तों पर कटाक्ष के साथ ही सोचने पर मजबूर किया। साथ ही उन्होंने लंगड़े होने के फायदे और हकलेपन के फायदों को अपने अंदाज में पेश करते हुए मध्य रात के बाद भी पाण्डाल में हंसी के फव्वारे छुड़ा दिए।
'पाकिस्तानियों कम आंको भारतीय को.. विनित चौहान
कवि सम्मेलन में विनित चौहान ने हम देशद्रोह के विषधर फन प र चढकऱ नाचे तो हैं, धीमा ही सही पर तमाचा मारा तो है, पढकऱ श्रोताओं ऐसा जोश भरा की चारों और से देशभक्ति के नारे गूंजने लगे। पाकिस्तानियों कम मत आंकों भारतीयों...डीएनए कराओ टेस्ट पाकिस्तान इंडिया की नाजायज औलाद है, सुनाकर श्रोताओं में जोश भर दिया। सांप जब तक न आस्तीनों के मारे जाएंगे, हर जंग हम हारे जाएंगे, सुनाई। उनकी देशभक्ति की रचनाओं पर पाण्डाल में सिर्फ देशभक्ति के नारे लगे बल्कि श्रोताओं ने मध्य रात बाद भी तिरंगा तक लहरा दिया।
Published on:
08 Apr 2022 11:26 am
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