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बंद हो सकती है अन्नपूर्णा दूध योजना!

-योजना के प्रभारियों से बजट की मांगी जानकारी-स्कूलों में योजना बंद होने की चर्चा

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बंद हो सकती है अन्नपूर्णा दूध योजना!

बंद हो सकती है अन्नपूर्णा दूध योजना!

राजसमंद. पूर्व भाजपा सरकार कार्यकाल के अंतिम चरण में शुरू की गई अन्नपूर्णा दूध योजना बंद हो सकती है। सरकार ने स्कूलों से बजट की जानकारी मांगी है। दूध योजना से जुड़े प्रभारियों का कहना है कि इससे पहले ऐसी जानकारी नहीं मांगी गई है। ऐसे में स्कूलों में चर्चा है कि अब योजना बंद की जा सकती है। हालांकि अभी इसबारे में अधिकारी कुछ बोलने को तैयार नहीं हैं।
दरअसल प्रदेश में २२ मार्च २०२० को लगे लॉकडाउन में सभी स्कूल बंद कर दिए गए, जिसके बाद अन्नपूर्णा दूध योजना भी बंद हो गई। जैसे ही लॉकडाउन खुला तो सरकार ने मिड-डे-मिल योजना के तहत बच्चों के परिजनों को इसका अनाज उपलब्ध करवा दिया, यानि मिड-डे-मिल योजना शुरू कर दी गई, लेकिन अन्नपूर्णा दूध योजना २२ मार्च के बाद से ही बंद है। नाम नहीं छापने पर मिड-डे-मिल के प्रभारियों ने बताया कि अब विभाग द्वारा उनसे बजट के बारे में जानकारी भरवाई गई है। जिसमें यह पूछा गया है कि किस स्कूल के पास कितना बजट इस मद का है। बताया जाता है कि कुछ स्कूल प्लस में हैं तो कुछ माइनेस में। ऐसे में इस मद में जिन स्कूलों के पास प्लस में राशि है वह वापस जाएगी।

यह भी कारण
कोरोना संक्रमण के चलते योजना का संचालन पिछले चार माह से बंद है, और अभी भी यह तय नहीं है कि स्कूल कब खुलेंगे। ऐसे में बच्चों को तंदुरुस्त करने के मकसद से शुरू की गई योजना का मकसद पूरा नहीं होगा। क्योंकि अभी भी स्कूलों के खुलने की तिथि तय नहीं है। देश-प्रदेश में जिस तरह के हाल चल रहे हैं, उससे लगता है कि अभी महीनों तक ऐसी ही स्थिति रहेगी।

यह है योजना
जुलाई २०१८ में पूर्व भाजपा सरकार ने अन्नपूर्णा दूध योजना शुरू की थी। शुरू में यह योजना पांतरे (एक दिन छोड़कर) थी। बाद में अक्टूबर-नवम्बर माह में इसे रोजाना कर दिया गया। योजना के तहत कक्षा एक से आठ तक के बच्चों को फीका दूध दिया जा रहा था। शुरुआत में ही करीब २५ हजार लीटर दूध की खपत रोजाना थी, जो अब बढ़कर औसत ३० हजार लीटर रोजाना हो गई थी।

विवादों में रही योजना
योजना शुरुआत से ही विवादों में रही। दूध में पानी मिलाना, स्कूलों में इसी दूध की चाय बनाना, डेयरी से कम दूध लेकर ज्यादा का बिल पेश करना, कम गुणवत्ता का दूध वितरित करने सहित कई आरोप इस योजना के तहत स्कूल और प्रभारियों पर लगते रहे हैं। पत्रिका स्टिंग में भी एकबार दो स्कूलों के प्रभारी कम दूध लेकर ज्यादा का बिल देने और बाद में डेयरी से बचे पैसे लेते सामने आए थे। हालांकि बाद में शिक्षा विभाग मामले को दबा गया था।