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DECISION : कोर्ट के स्टे की अवहेलना पर मकान ध्वस्त करने और तीन माह कैद की सजा

अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट नाथद्वारा ने दिए आदेश

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नाथद्वारा. अतिरिक्ति मुख्य न्यायिक मजिस्टे्रट नाथद्वारा लक्ष्मीकान्त वैष्णव ने एक महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए न्यायालय की अवमानना करने पर दो आरोपितों को मकान ध्वस्त करने एवं तीन माह की सजा के आदेश दिए हैं। अधिवक्ता ईश्वरसिंह सामोता, संतोष सनाढ्य एवं कमलनयन सनाढ्य ने बताया कि बिजनोल निवासी राजेश पालीवाल एवं हिम्मतसिहं राजपूत ने न्यायालय में प्रार्थना पत्र पेश कर बताया कि बिजनोल में विगत १ नवंबर २०१३ को वादग्रस्त स्थल पर यथास्थिति के न्यायालय के आदेश के बावजूद गांव के ही पूरण लौहार एवं रामचन्द्र लौहार के द्वारा न्यायालय के आदेश की अवहेलना करते हुए मकान बना लिया गया। जबकि, तात्कालिक कोर्ट द्वारा नियुक्त कमिश्नर लालजी मीणा के द्वारा प्रस्तुत की गई रिपोर्ट की अनदेखी की गई। इस पर न्यायालय द्वारा मौका रिपोर्ट के अनुसारएक नवंबर 2013 को मौके की यथावत स्थिति बनाए रखने का आदेश पारित होते हुए भी आरोपितों द्वारा निरन्तर मौके पर निर्माण कार्य जारी रखा गया और न्यायालय के आदेश की कोई पालना नहीं की। इस पर न्यायालय द्वारा प्रार्थी के प्रार्थना पत्र पर पुन: कमिश्नर नियुक्त किया, जिस पर मौके पर पहले की रिपोर्ट एवं दूसरी रिपोर्ट में भारी निर्माण कार्य किया जाना पाया गया। इन सभी तथ्यों को न्यायालय द्वारा अत्यन्त गम्भीर मानते हुए स्थगन के बाद किए गए समस्त निर्माण कार्य को एक माह में ध्वस्त करने एवं नहीं करने पर प्रार्थीगण द्वारा स्वयं ध्वस्त करने का आदेश दिया गया। साथ ही दोनों आरोपितों को तीन माह कैद की सजा भी सुनाई।


फैसले पर पुनर्विचार को दिया ज्ञापन
नाथद्वारा. स्थानीय जन मेवाड़ आदिवासी संगठन के द्वारा अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा दिए गए फैसले में सरकार से पुनर्विचार याचिका दायर करने की मांग की गई है। संस्था के तुलसीराम मीणा, शांतिलाल भूरिया, शांतिलाल अहीर, शंकरलाल, राजेश, तुलसीराम आदि के द्वारा राष्ट्रपति के नाम उपखंड अधिकारी को सौंपे ज्ञापन में बताया कि उच्चतम न्यायालय के द्वारा अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत तुरंत गिरफ्तारी पर रोक लगाए जाने एवं सक्षम अधिकारी व सरकार की अनुमति आवश्यक करने के निर्णय से आदिवासियों व दलितों पर अत्याचार करने वालों को संरक्षण मिलेगा। साथ ही शिकायत वापस लेने पर दबाव बनाने के अवसर भी मिलेंगे। ऐसे में सरकार को चाहिए कि इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका दायर कर आदिवासियों को सरंक्षण प्रदान करे।