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Video : दूध की बिक्री कम हुई तो घर-घर दही, छाछ व घी बढ़ा

शृंखला : लॉकडाउन - ये है गांव के हाल- लॉकडाउन से बदली ग्रामीण जीवनशैली- कुछ जगह छाछ बिलौने की परम्परागत तक तरीका हुआ जीवंत

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दूध की बिक्री कम हुई तो घर-घर दही, छाछ व घी बढ़ा

दूध की बिक्री कम हुई तो घर-घर दही, छाछ व घी बढ़ा

आईड़ाणा. लॉकडाउन के बाद ग्रामीण जीवनशैली में भी काफी बदलाव आए हैं। इस समय घरों में दही, घी एवं छाछ की प्रचुरता दिखाई ेदेने लगी है। समय एवं जिन्दगी की भागदौड़ ने ग्रामीणों की जीवन शैली को भी बदल कर रख दिया था तथा ग्रामीण अपने घरों में दूध की खपत कम कर उसे बाजार में बेचने लगे थे। ऐसे में थोड़े से पैसों की खातिर घर में दुधारू पशु होने के बाद भी दूध, दही, छाछ एवं घी की कमी रहने लगी थी। पर इस लॉकडाउन ने फिर से पुराने दिन लौटा दिए हैं। अब दूध बाहर जा नहीं रहा और घर-घर दूध व अन्य सामग्री पर्याप्त मात्रा में रहने लगी है। जिनके घर दुधारू पशु नहीं हैं, वे पड़ौसी भी उनके घर से छाछ आदि ले जाने लगे हैं। लॉकडाउन के बाद गांवों में घर-घर दूध से दही बन रहा है और सवेरे छाछ बिलोने की आवाजें सुनाई देने लगी हैं।
कहीं आधुनिक तो कहीं परम्परागत तरीके से तैयार हो रही छाछ
छाछ तैयार करने की परम्परागत तकनीक अब कम जगह ही देखने को मिल रही है। घरों में विद्युत चलित मशीनों पर छाछ तैयार होने लगी है। हालांकि कुछ जगह छाछ बिलोने की परम्परागत तकनीक जीवंत भी हुई है। परम्परागत तकनीक में पहले दही को मथने के लिए गोळी (बर्तन) में दही लेकर रवाई (झेरणा), सिंकला एवं नेतरा से दही को मथा जाता था। इसके बारे में जानकारी रखने वाले ही यह कार्य करते हैं। गर्म एवं ठण्डा पानी जरूरत के अनुसार मिलाया जाता है, जिससे घी अलग हो जाता है। पहले कृषि एवं पशुपालन का कार्य मुख्य होने एवं दूध का व्यापार नहीं होने से हर घर में छाछ बिलोने का कार्य होता था। दूध का व्यापार बढऩे व पशुधन कम होने से घर-घर छाछ बनाने का कार्य कम हो गया, कई स्थानों पर छाछ तैयार करने को विद्युत चलित मशीन को उपयोग बढ़ गया।
गर्मी में कम हो जाता है दूध
मेवाड़ में पथरीली जमीन एवं पानी की कमी के चलते गर्मी में पशुओं को पर्याप्त हरा चारा नहीं मिलता। इससे पशुओं में दूध की मात्रा कम हो जाती हैं। कई बार तो चारे की कमी व अन्य कारणों से पशु दूध देना बंद कर देते हैं।