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HUMAN STORY : बीमारी लील गई दोनों पैर, अब रोजीरोटी के लिए मोहताज हो गया बाबूलाल

खेड़ा हाल राजनगर के बाबूलाल को समय ने किया अपंग, व्यवस्था ने बनाया मजबूर

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राजसमंद. शरीर स्वस्थ है, मन में कुछ करने की इच्छा भी है लेकिन समय की मार ने उसे घर बैठने पर मजबूर कर दिया है। सरकार की योजनाएं भी उसकी पहुंच से दूर हैं। हम बात कर रहे हैं सार्दुलखेड़ा निवासी, हालमुकाम राजनगर बाबूलाल (४०) पुत्र कुशाल सालवी की। बाबूलाल पांच वर्ष पूर्व माइंस में काम ? करके अपने परिवार का पालन पोषण करता था, लेकिन तभी एक दिन अचानक उसके दाएं पैर में दर्द हुआ और सुन्नता आ गई, जब चिकित्सकों को दिखाया तो पता चला की इसके पैर की रक्तधमियां जाम हो गई हैं, जिससे पैर में मवाद पड़ गया है पैर काटना पड़ेगा। इस पर उसने अहमदाबाद के चिकित्सकों को दिखाया तो वहां भी यही बात बताई गई। आखिर में करीब चार साल पूर्व उसका चिकित्सकों ने ऑपरेशन कर एक पैर काट दिया। इस पर जैसे-तैसे वह अपना जीवन एक पैर के सहारे काट रहा था, तभी करीब एक साल पूर्व फिर से उसके बाएं पैर में दर्द उठा और चिकित्सकों को दिखाया तो पता चला वही समस्या इस पैर में भी हो गई है, अंत में उसे दूसरा पैर भी कटवाना पड़ा। आज वह राजनगर के धोबी मोहल्ला स्थिति एक किराए के घर पर रहकर जैसे-तैसे जीवन यापन कर रहा है।

पांच लाख हुए खर्च, कर्ज में डूबो दिया
बाबूलाल ने बताया कि जब ऑपरेशन हुआ तो जिंदगी भर की कमाई और बचत पैर के ऑपरेशन में (करीब ढाई लाख रुपए) खर्च हो गई। दूसरीबार ऑपरेशन के लिए पैसे नहीं थे, इस पर उसने रिश्ते-नातेदारों से करीब २ लाख रुपए का कर्ज लेकर ऑपरेशन करवाया। अब पत्नी जैसे-तैसे मजदूरी करके मुश्किल से घर चला रही है ऐसे में कर्ज चुकाना और बेटी को पढ़ाना उसके लिए काफी मुश्किल भरा हो गया है। बाबूलाल ने बताया कि उसे समाज कल्याण विभाग से पांच सौ रुपए की पेंशन मिलती है, जबकि घर का किराया ही १२०० रुपए देना पड़ता है, ऐसे में उसकी आर्थिक स्थिति काफी खराब हो गई है।

पढ़ाई के साथ बेटी भी कर रही सहयोग
बाबूलाल के मात्र एक बेटी है संजू, जो कक्षा पांच में बालिका विद्यालय में पढ़ती है। घर की आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए वह स्कूल से आने के बाद घर पर ही पिता के साथ माला बुनाई का काम करती है। बाबूलाल ने बताया कि हम दोनों लोग मिलकर ४०-५० रुपए का काम ही कर पाते हैं।

टूट रहा सपना
बाबूलाल ने बताया कि उसके एक ही बेटी है। उसका सपना था कि वह खूब पढ़ लिखकर डॉक्टर या मास्टर बने। जब वह स्वस्थ था तब उसे निजी स्कूल में पढ़ाता भी था, लेकिन आर्थिक तंगी के चलते अब वह फीस का बोझ नहीं उठा पाता। इससे उसे लगता है कि अब उसका सपना शायद साकार नहीं हो पाएगा।