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कुंभलगढ़ टाइगर रिजर्व : जिस जंगल को कहा गया बाघ-विहीन, वहां छिपा है बड़ा इतिहास

Kumbhalgarh Tiger Reserve : कुंभलगढ़ टाइगर रिजर्व को लेकर जारी बहस के बीच यह दावा कि कुंभलगढ़ क्षेत्र में कभी बाघ नहीं थे अब ऐतिहासिक दस्तावेजों, शोधपत्रों और शिकार अभिलेखों के सामने कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है।
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Kumbhalgarh Tiger Reserve

Kumbhalgarh Tiger Reserve: AI-generated photo

Kumbhalgarh Tiger Reserve : कुंभलगढ़ (राजसमंद)। कुंभलगढ़ टाइगर रिजर्व को लेकर जारी बहस के बीच यह दावा कि कुंभलगढ़ क्षेत्र में कभी बाघ नहीं थे अब ऐतिहासिक दस्तावेजों, शोधपत्रों और शिकार अभिलेखों के सामने कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है। वन्यजीव विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं का मानना है कि किसी भी क्षेत्र में अतीत में बाघों की उपस्थिति का निर्णय राजनीतिक बयानों के बजाय प्रमाणिक ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर होना चाहिए।

कुंभलगढ़ फाउंडेशन के विधिक सलाहकार एडवोकेट ऋतुराज सिंह राठौड़ के अनुसार प्रकाशित शोधपत्रों, महाराणा फतेह सिंह कालीन अभिलेखों और वन विभाग के पुराने रिकॉर्ड में कुंभलगढ़ एवं आसपास के वन क्षेत्रों में बाघों की मौजूदगी और उनके शिकार के अनेक उल्लेख मिलते हैं। उनके अनुसार ऐसे में यह कहना कि इस क्षेत्र में कभी बाघ नहीं रहे, उपलब्ध ऐतिहासिक तथ्यों से मेल नहीं खाता।

शोध अध्ययनों में भी पुष्टि

शोधकर्ताओं के अनुसार बीएन यूनिवर्सिटी उदयपुर से जुड़े अध्ययनों में मेवाड़ क्षेत्र के कई हिस्सों में अतीत में सिंह, चीता और बाघों की उपस्थिति का उल्लेख मिलता है। इन अध्ययनों में यह भी बताया गया है कि अत्यधिक शिकार, आवास विनाश और मानव दबाव के कारण समय के साथ इन प्रजातियों का धीरे-धीरे लोप होता गया।

महाराणा कालीन अभिलेखों में शिकार के प्रमाण

कुंभलगढ़ क्षेत्र से जुड़े ऐतिहासिक दस्तावेजों में सायरा, पालर, उमरदा, घाणेराव, नानोर और झीलवाड़ा जैसे स्थानों पर बाघों के शिकार के उल्लेख दर्ज हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ये केवल शिकार की घटनाएं नहीं हैं, बल्कि इस बात के भी प्रमाण हैं कि उस समय यह क्षेत्र बाघों के लिए उपयुक्त प्राकृतिक आवास था।हकीकत बहिड़ा जैसे ऐतिहासिक रिकॉर्ड में वर्ष 1886 से 1972 तक विभिन्न स्थानों पर बाघों की उपस्थिति और शिकार से संबंधित प्रविष्टियां दर्ज हैं, जिन्हें कुंभलगढ़ वन क्षेत्र में बाघों के लंबे समय तक प्राकृतिक रूप से मौजूद रहने के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

प्रकाशित साहित्य में भी उल्लेख

वन्यजीव शोधकर्ता प्रिया सिंह की पुस्तक लोस्ट टाइगर्स, प्लडर्ड फोरेस्ट में सायरा, देसूरी, जोजावर, नानोर और रणकपुर क्षेत्र में 1965 से 1970 के बीच बाघों की उपस्थिति का उल्लेख मिलता है। विशेषज्ञों के अनुसार यह दर्शाता है कि बाघों का अस्तित्व केवल प्राचीन इतिहास तक सीमित नहीं था, बल्कि अपेक्षाकृत हाल के दशकों तक भी इस क्षेत्र में उनकी मौजूदगी रही है।

रावली-टॉडगढ़ क्षेत्र से भी ऐतिहासिक प्रमाण

कुंभलगढ़ टाइगर रिजर्व प्रस्तावित क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले रावली-टॉडगढ़ अभयारण्य से भी बाघों की ऐतिहासिक उपस्थिति के प्रमाण सामने आए हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार रावली रेंज, सातूखेड़ा ब्लॉक और टॉडगढ़ ब्लॉक में बाघों की मौजूदगी के रिकॉर्ड उपलब्ध हैं। इसके अलावा खारवा के जागीरदारों द्वारा किए गए बाघ शिकार के उल्लेख रावली वन विश्राम गृह के रजिस्टरों में दर्ज पाए गए हैं, जिन्हें वन्यजीव वितरण के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक साक्ष्य माना जाता है।
विशेषज्ञों की राय: ऐतिहासिक तथ्यों को नकारा नहीं जा सकता

विशेषज्ञों का कहना है कि जब कुंभलगढ़ और रावली-टाटगढ़ दोनों क्षेत्रों से बाघों की मौजूदगी के दस्तावेजी प्रमाण मिलते हैं, तो यह दावा कि इस पूरे क्षेत्र में कभी बाघ नहीं थे, ऐतिहासिक रिकॉर्ड के विपरीत प्रतीत होता है। इसी कारण संरक्षण विशेषज्ञ इस बहस को भावनाओं या राजनीतिक दृष्टिकोण के बजाय वैज्ञानिक और ऐतिहासिक आधार पर देखने की बात करते हैं।

टाइगर रिजर्व निर्धारण में केवल वर्तमान नहीं, इतिहास भी महत्वपूर्ण

वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार किसी क्षेत्र को टाइगर रिजर्व घोषित करने का आधार केवल वर्तमान बाघ संख्या नहीं होता। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण के मानकों में आवास की गुणवत्ता, वन क्षेत्र की निरंतरता, शिकार आधार, ऐतिहासिक वितरण और भविष्य की संरक्षण संभावनाओं को भी शामिल किया जाता है। अरावली पर्वत श्रृंखला, विस्तृत वन क्षेत्र और उपलब्ध ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर कुंभलगढ़ क्षेत्र को बाघ पुनर्स्थापन के लिए उपयुक्त माना जा रहा है।

सांसद ने कुंभलगढ़ टाइगर रिजर्व को निरस्त करने की उठाई थी मांग

कुंभलगढ़ में प्रस्तावित टाइगर रिजर्व को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। इस मामले में राजसमंद सांसद महिमा कुमार मेवाड़ ने केन्द्र सरकार को पत्र लिखकर इस योजना के पूरी तरह से निरस्त करने की मांग की थी। उन्होंने पत्र में उल्लेख किया था कि कुंभलगढ़ का यह भूभाग बाघों की स्थायी आबादी को बनाए रखने के लिए उपयुक्त नहीं है। उन्होंने पत्र में ये भी लिखा था कि यहां कृत्रिम रूप से बाघों को बसाया गया तो वर्तमान पारििस्थतक तंत्र प्रभावित हो सकता है। इस मामले सांसद से बात करनी चाही लेकिन बात नहीं हो सकी।