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अब कक्षा में मचेगी गवरी की धूम

मेवाड़ का लोक नृत्य 10वीं के राजस्थान का इतिहास एवं संस्कृति पुस्तक में शामिल

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अब कक्षा में मचेगी गवरी की धूम

अब कक्षा में मचेगी गवरी की धूम

आईडाणा. कोरोना महामारी के चलते भले ही स्कूल बंद हैं, लेकिन जब भी खुलेेंगे तो कक्षा में गवरी की धूम मचेगी। ऐसे में जो बचपन में देखा एवं किया उसी के बारे में पढ़ाई कर परीक्षा देना पड़े तो कहना ही क्या।
कुछ यही स्थिति मेवाड़ के ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों के साथ होगी। इस वर्ष माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने कक्षा 10 के राजस्थान का इतिहास एवं संस्कृति नामक नई पुस्तक के अध्याय 8 राजस्थान के लोक नृत्य और लोक नाट्य में गवरी का विस्तार से वर्णन किया है। पाठ में गवरी उद्भव और परिचय के साथ लघुनाटिकाओं के पात्र एवं स्वांग की मायड़ भाषा मेवाड़ी में जानकारी दे रखी है। यह सम्पूर्ण जानकारी ग्रामीण क्षेत्र का बालक बचपन से जानते हैं, क्योंकि मेवाड़ में प्रतिवर्ष डेढ़ माह तक गांव-गांव में गवरी का खेल खेला जाता है। वहीं आदिवासी भील समाज का बच्चा गवरी में पात्र की भूमिका भी निभाता है। इससे बच्चों का ज्ञान अभिनय एवं दृष्य से शिक्षक से कहीं ज्यादा है।

किताब से मिलेगी ये जानकारी
वादन, संवाद, प्रस्तुतिकरण और लोक-संस्कृति के प्रतीकों में मेवाड़ के भीलों की गवरी अनूठी है। इसमें पौराणिक कथाओं, लोक-गाथाओं और लोक-जीवन की विभिन्न झांकियों पर आधारित नृत्य नाटिकाएं होती हैं। गवरी एवं धार्मिक लोकनाट्य है, जो शिव भस्मासुर की कथा पर आधारित है। रक्षाबंधन के दूसरे दिन ***** कृष्णा एकम् को खेड़ा देवी से भोपा गवरी मंचन की आज्ञा लेता है। इसके बाद पात्रों के वस्त्र बनते हैं। पात्र मंदिरों में 'धोक' देकर नव-लाख देवी-देवता, चौसठ योगिनी और बावन भैरू को स्मरण करते हैं। गवरी सवा महीने तक खेली जाती है। इस अवधि में शराब, मांस और हरी सब्जी का निषेध होता है। जिस गांव से गवरी आरम्भ होती है वह इसका खर्च वहन करता है।

गवरी का मुख्य पात्र बूढिय़ा भस्मासुर का जप होता है। 'राया' स्त्री रूप में पार्वती और विष्णु की प्रतीक होती है। झामट्या लोकभाषा में कविता पाठ करता है। खड्कड्या उसे दोहराते हुए जोकर का काम करता है। बूढिय़ा खट्कड्ये के संवाद में पूरक बनता है। अन्य पात्र 'खेला' कहलाते हैं। गवरी में केवल पुरूष पात्र होते हैं। इसमें गणपति, भमरिया, भेआवड़, मीणा, कान-गूजरी, जोगी, खाड़लिया भूत, लाखा बणजारा, नट्ड़ी तथा माता और शेर के खेल होते है।

बाहरी शिक्षकों के लिए होगा आसान
मेवाड़ के अधिकतर स्कूलों में शिक्षक मेवाड़ अंचल से बाहर के हैं, उन्हें लोक नृत्य गवरी के बारे मे विस्तार से जानकारी नहीं है। जबकि, ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों को इसकी विस्तृत जानकारी है। ऐसे में शिक्षकों के लिए इस नृत्य का अध्ययन करवाना आसान होगा।