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शिक्षा विभाग में ‘यथास्थान’ की प्रवृत्ति बढ़ी, 28 हजार पदोन्नत शिक्षा अधिकारी पदस्थापन के इंतजार में

शिक्षा विभाग में पिछले एक वर्ष से एक नई प्रवृत्ति तेजी से उभर रही है। शिक्षकों और अधिकारियों को पदोन्नति तो मिल रही है, लेकिन उन्हें नई जगह तैनाती (पदस्थापन) नहीं मिल पा रही।

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Education News

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मधुसूदन शर्मा

राजसमंद. शिक्षा विभाग में पिछले एक वर्ष से एक नई प्रवृत्ति तेजी से उभर रही है। शिक्षकों और अधिकारियों को पदोन्नति तो मिल रही है, लेकिन उन्हें नई जगह तैनाती (पदस्थापन) नहीं मिल पा रही। इसके कारण स्कूलों में पढ़ाई और प्रशासनिक व्यवस्था प्रभावित हो रही है, क्योंकि कई संस्थानों को अभी भी संस्था प्रधान और उप-प्रधान की कमी का सामना करना पड़ रहा है। वर्तमान व्यवस्था में पदोन्नति के बाद अधिकारियों को यथास्थानकार्यग्रहण करने के निर्देश दिए जा रहे हैं। इससे विभाग के पदोन्नति आंकड़े तो बढ़ रहे हैं, लेकिन विद्यार्थियों को इसका अपेक्षित लाभ नहीं मिल पा रहा। पिछले एक साल में 28 हजार से अधिक शिक्षा अधिकारी पदोन्नत हुए हैं, जो अब भी अपने पदस्थापन का इंतजार कर रहे हैं। यदि इनकी तैनाती हो जाए, तो स्कूलों में रिक्त प्रधानाचार्य, उप-प्रधानाचार्य और व्याख्याता के पद भरे जा सकते हैं। आंकड़ों के अनुसार, करीब 4,200 प्रधानाचार्य पदों पर पदोन्नत अधिकारी पिछले एक साल से तैनाती का इंतजार कर रहे हैं। फिलहाल उन्हें यथास्थान ही कार्य करने के आदेश हैं, जिसके चलते कई स्कूलों में एक ही समय में 2 से 4 प्रधानाचार्य कार्यरत हैं। वे मई 2025 से पदोन्नति के सभी लाभ ले रहे हैं, लेकिन उनकी सेवाओं का उपयोग अन्य रिक्त स्कूलों में नहीं हो पा रहा।

स्कूलों में पदों की आवश्यकता

इसी प्रकार, सितंबर 2025 में उप-प्रधानाचार्य पद पर पदोन्नत हुए 11,886 अधिकारी भी लगभग सात महीने से पदस्थापन की प्रतीक्षा में हैं। कई स्कूलों में एक साथ 3-4 उप-प्रधानाचार्य यथास्थान कार्यरत हैं, जबकि जिन स्कूलों में इन पदों की आवश्यकता है, वहां इनकी नियुक्ति नहीं हो पा रही। ऐसी स्थिति में संस्था प्रमुखों के लिए यह तय करना भी कठिन हो रहा है कि इन पदोन्नत अधिकारियों से किस प्रकार का कार्य लिया जाए।

व्याख्याता कार्य लेना उचित नहीं

व्याख्याता और प्रधानाध्यापक पद से पदोन्नत अधिकारी अपने नए पद के अनुरूप कार्य करने के इच्छुक हैं, लेकिन वर्तमान स्कूलों में सभी को उसी स्तर का कार्य देना संभव नहीं है। कई पदोन्नत व्याख्याता खुद को उप-प्रधानाचार्य के रूप में देखते हैं और कक्षाएं लेने को अपनी पद गरिमा के अनुरूप नहीं मानते। उनका तर्क है कि जब वे उप-प्रधानाचार्य पद के लाभ ले रहे हैं और उसी पद पर कार्यग्रहण किया है, तो उनसे व्याख्याता का कार्य लेना उचित नहीं है।

पदस्थापन का इंतजार बरकरार

हाल ही में करीब 12 हजार वरिष्ठ अध्यापकों को व्याख्याता पद पर पदोन्नत किया गया है, जिन्हें भी यथास्थान कार्यग्रहण के निर्देश दिए गए हैं। इसके कारण एक ही स्कूल में कई वरिष्ठ अध्यापक अब व्याख्याता के रूप में पदोन्नत होकर कार्य कर रहे हैं और उनकी तैनाती का इंतजार जारी है। इस प्रकार कुल मिलाकर लगभग 28 हजार पदोन्नत शिक्षा अधिकारी अब भी अपने पदस्थापन की प्रतीक्षा कर रहे हैं। कई प्रधानाचार्य और उप-प्रधानाचार्य तो बिना नई तैनाती पाए ही अपने पुराने स्थान से सेवानिवृत्त भी हो चुके हैं। 20 अप्रैल को हुई व्याख्याता पदोन्नतियों के बाद भी तैनाती की प्रक्रिया अनिश्चित बनी हुई है। पहले प्रधानाचार्यों की काउंसलिंग, उसके बाद उप-प्रधानाचार्यों और फिर व्याख्याताओं की काउंसलिंग प्रस्तावित है, जिससे पूरी प्रक्रिया में और समय लग सकता है।

इनका कहना है

वर्तमान में जहां जरूरत है वहां कर्मचारी उपलब्ध नहीं है। कहीं एक ही पद पर एक से अधिक कार्मिक कार्यरत हैं। पहले डीपीसी के बाद तुरंत पदस्थापन होता था, लेकिन अब यह प्रक्रिया टल रही है। यथा स्थान की प्रवृत्ति पर अंकुश लगना चाहिए। इस पर सरकार को ध्यान देने की जरूरत है। ताकि पदरिक्त वाली स्कूलों को इसका लाभ मिल सके।

-मोहरसिंह सलावद, प्रदेशाध्यक्ष, शिक्षक संघ रेस्टा