
लक्ष्मणसिंह राठौड़/भैरूलाल कुमावत @ राजसमंद
गांव-ढाणी को खुले में शौच मुक्त बनाने की सरकारी मंशा सिर्फ कागजी खानापूर्ति तक सीमित होकर रह गई। पंच, सरपंच व सरकारी कार्मिकों की तरह ही आमजन के घर भी शौचालय के नाम पर अधूरे ढ़ांचे की खानापूर्ति ही हुई है। अब इन ढ़ांचों का उपयोग कोई सिर्फ नहाने के लिहाज से बाथरूम के रूप में कर रहा है, तो कोई चारपाई ढाल सोने के काम में ले रहा है। कई जगह तो जलाऊ लकड़ी, कंडे का भंडारण करने से ये कबाडख़ाने बन गए हैं।
स्वच्छ भारत मिशन के तहत बने शौचालयों का कुछ यही सच पत्रिका टीम के राजसमंद के साथ ही रेलमगरा, खमनोर, कुंभलगढ़, आमेट, देवगढ़ व भीम तक के गांव ढाणियों में जाने पर सामने आया। ज्यादातर जगह शौचालय बनाने की कागजी औपचारिकता पूरी करने के ही प्रयास किए गए। इसके चलते घर- घर में शौचालय बनाने के लक्ष्य आंकड़ों में तो लगभग पंचायतीराज विभाग ने अर्जित कर लिए, मगर हकीकत में शौचालय के वे अधूरे ढ़ांचे किसी काम के नहीं है और न ही उनका कोई औचित्य रह गया है। इससे पंचायत के पंच, सरपंच, ग्रामसेवक से लेकर पंचायत समिति तक के अफसरों की भूमिका सवालों के घेरे में आ गई है।
यह है प्रमुख केस
केस 1 : सेलागुड़ा (आमेट) में सोहन पुत्र मांगीलाल लौहार के घर शौचालय का ढ़ांचा बनाया। सत्यापन किए बिना ही पंचायत ने स्वच्छता का ठपा ठोक कर शौचालय बनने का कागजी लक्ष्य अर्जित कर लिया। उसके बाद वृद्धा ने उसमें चारपाई ढाल दी, जो उसके लिए आशियाना ही बन गया है। चारपाई के एक पागे से बकरी भी उसी से बांधी जा रही है।
केस 2 : सेलागुड़ा पंचायत के रेबारियों की ढाणी में बना शौचालय भी सिर्फ कागजी खानापूर्ति के लिए बना। यहां उसका दरवाजा भी नहीं खुलता। क्योंकि अधूरे ढ़ांचे का शौचालय के लिए उपयोग ही नहीं किया जा सकता।
केस 3 : बीकावास में एक मकान के पास ईंटे चुन कर शौचालय का ढ़ांचा खड़ा किया, जिसके किवाड़ भी लगाया और डब्लूसी लगाई। सरकारी आंकड़ों में शौचालय की खानापूर्ति होने के बाद उसका उपयोग अब सिर्फ तिनके, कंडे रखने में उपयोग किया जा रहा है।
बाड़ों में बनाए शौचालय के ढ़ांचे
ग्रामीण क्षेत्र में लोगों ने ज्यादातर शौचालय के ढ़ांचे अपने घर की बजाय बाड़ों में बनाए, जहां सिर्फ गोबर के कंडे अथवा घास-फुस, तिनके रखने के ही काम में आ रहे हैं।
पिता-पुत्र और भाई के जोड़े में शौचालय
सेलागुड़ा में रूपसिंह पुत्र नारायणसिंह रावत के घर पिता व पुत्र का जोड़े से शौचालय बनाया। किवाड़ लगे नहीं और डब्लूसी भी नहीं लगाई। फिर भी ग्राम पंचायत द्वारा शौचालय निर्माण का ठप्पा पुताई कर लगा दिया। अभी अधूरे ढ़ांचे का कोई उपयोग नहीं है। इसी तरह घीसासिंह व रामसिंह के भी जोड़े से शौचालय के ढ़ांचे बनाए हैं, जिनका भी कोई उपयोग नहीं हो पा रहा है। अस्पताल के पास एक मकान में बना शौचालय अब स्नानघर के काम आ रहा है।
तो कैसे हो गया सत्यापन
स्वच्छ भारत मिशन को लेकर केन्द्र सरकार की सख्ती के बाद सरपंच व ग्रामसेवकों ने शौचालय बनाने के लिए ग्रामीणों को खूब पे्ररित व प्रोत्साहित किया। 12 हजार रुपए प्रोत्साहन राशि मिलने के लालच में कई लोगों ने सिर्फ ढ़ांचे खड़े किए और प्रशासन द्वारा भी उन्हीं अधूरे ढ़ांचों को शौचालय का तमगा देकर भौतिक सत्यापन की औपचारिकता पूरी कर ली। शौचालय की प्रोत्साहन राशि का भुगतान करने से पहले जिन जिन कार्मिक व अफसरों द्वारा शौचालय का भौतिक सत्यापन किया गया है, उनकी कार्यशैली संदेह के दायरे में आ गई है।
जांच के बाद करेंगे कार्रवाई
कहीं शौचालय के अधूरे ढ़ांचे ही बने हैं, तो गलत है। इसके लिए बीडीओ व ग्रामसेवक को निर्देशित करेंगे। जिनके घर शौचालय पूर्ण बन गए हैं, मगर उपयोग नहीं कर रहे हैं, तो उन्हें भी प्रेरित किया जाएगा। स्वच्छ भारत मिशन का ध्येय ही यह है कि शौचालय बने और उसका हर व्यक्ति उपयोग करें। यही तो प्रयास करने हैं। इसको लेकर सीईओ व सभी बीडीओ को सख्त निर्देश दिए जाएंगे।
पीसी बेरवाल, जिला कलक्टर राजसमंद
Published on:
28 Nov 2017 09:21 am
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