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WILLFULNESS : उत्तरप्रदेश में निजी स्कूलों पर लगाम का विधेयक, राजस्थान में क्यों नहीं ?

सरकार की उदासीनता की वजह से निजी स्कलों की चल रही मनमानी

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राजसमंद. पड़ोसी भाजपा शासित राज्य, उत्तर प्रदेश ने निजी स्कूलों पर ‘उत्तर प्रदेश स्ववित्तपोषक शुल्क निर्धारण विधेयक’ की नकेल डाली है। सीधे तौर पर इसका फायदा अभिभावकों को होगा। हमारे यहां भी भाजपा सरकार है। ऐसे में लोगों के मन में यह प्रश्न है कि निजी स्कूलों पर अंकुश लगाने में हमारी सरकार नाकाम क्यों हैं? राज्य में राजस्थान विद्यालय (फीस का विनियम) अधिनियम २०१६, नियम २०१७ लागू है, लेकिन इसकी पालना भी जिम्मेदारों की लापरवाही और लचर प्रशासनिकतंत्र के चलते नहीं हो रही है। जिसका सीधा फायदा निजी विद्यालय उठा रहे हैं।

इस नियम पर ही कार्रवाई नहीं
माध्यमिक शिक्षा निदेशक नथमल डिडेल ने नियम २०१७ का हवाला देते हुए प्रदेश के सभी उपनिदेशकों, जिलाशिक्षाधिकारी (माध्यमिक) को आदेश जारी किया था। जिसमें डिडेल ने लिखा कि प्रत्येक निजी विद्यालय द्वारा स्वयं की बेवसाइट संचालित की जाए। स्कूल के पास बेवसाइट न होने पर सभी जानकारी नोटिस बोर्ड पर लगाई जाए। निजी विद्यालय अपने विवेकानुसार एनसीआरटी/ राजस्थान पाठ्य पुस्तक मंडल/ माध्यमिक शिक्षा बोर्ड/ निजी प्रकाशकों द्वारा पाठ्यक्रम के अनुसार प्रकाशित पाठ्य पुस्तकों में से विद्यार्थियों के शिक्षण के लिए पुस्तकों का चयन कर सकते हैं। लेकिन उनके लिए अनिवार्य होगा कि वे शिक्षण सत्र प्रारम्भ होने से कम से कम एक माह पूर्व पुस्तकों की सूची, लेखक एवं प्रकाशक कानाम तथा मूल्य की सूची अपने विद्यालय के नोटिस बोर्ड, बेवसाइट पर लगाएं। ताकि अभिभावक अपनी सुविधा के अनुसार इन पुस्तकों की खरीदारी खुले बाजार से कर सकें। पुस्तकों, कॉपियों के अलावा अभिभावक यूनिफॉर्म, टाई, जूते, कॉपियां आदि भी खुले बाजार से क्रय करने के लिए स्वतंत्र होंगे। किसी भी शिक्षण सामग्री पर विद्यालय का नाम अंकित नहीं होगा। किसी भी दुकान विशेष से पुुस्तकों के क्रय का दबाव नहीं बनाया जाएगा। शाला परिसर में पुस्तकों या अन्य सामग्री का विक्रय नहीं किया जाएगा। निजी विद्यालयों द्वारा विद्यार्थियों को निर्धारित की जाने वाली यूनिफॉर्म न्यूनतम ५ वर्षों तक नहीं बदली जाएगी। विद्यालय यह निश्चित करें कि विद्यार्थियों के लिए अनुशंषित की जाने वाली पाठ्य पुस्तकें यूनिफॉर्म एवं अन्य सामग्री न्यूनतम ३ स्थानीय विके्रताओं के पास उपलब्ध होंगी।

लापरवाह हुए जिम्मेदार!
जिले में जिम्मेदारों की लापरवाही के चलते डिडेल द्वारा जारी एक भी आदेश की पालना सख्ती से नहीं हो रही है। जिसके चलते निजी विद्यालय स्कूल परिसरों में पुस्तक बेचने से लेकर अन्य कार्य बेखौफ होकर कर रहे हैं। अभिभावकों के शिकायत करने पर भी जिम्मेदार कोई ध्यान नहीं दे रहे।

यह है ‘उत्तर प्रदेश स्ववित्तपोषक शुल्क निर्धारण विधेयक’
निजी स्कूलों पर नियंत्रण के लिए यूपी सरकार नया विधेयक लाई है। जिसका नाम है ‘उत्तर प्रदेश स्ववित्तपोषक शुल्क निर्धारण विधेयक’। इसके तहत स्कूल सिर्फ विवरण पुस्तिका शुल्क, प्रवेश शुल्क, परीक्षा शुल्क और सालाना शुल्क ही ले सकेगा। अगर कोई भी स्कूल नियम नहीं मानता है तो पहली बार 1 लाख, दूसरी बार 5 लाख और तीसरी बार नियम नहीं मानने पर मान्यता रद्द करने की कार्रवाई होगी। 12वीं क्लास तक सिर्फ एक बार प्रवेश शुल्क लिया जाएगा। कैबिनेट के ये फैसले और ये सारी व्यवस्था साल 2018 -19 में लागू होगी, लेकिन फीस व्यवस्था का आधार 2015.16 को ही माना जाएगा। फीस बढ़ाने के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) को मानक बनाया गया है। इसमें 5 फीसदी जोडऩे पर जो योग आएगा, उससे ज्यादा फीस नहीं बढ़ेेगी। जैसे सीपीआई 2 फीसदी है तो इसमें 5 प्रतिशत जोडऩे पर 7 फीसदी ही फीस बढ़ सकेगी। साथ ही यह विधेयक 20 हजार रुपये से ज्यादा सालाना फीस लेने वाले स्कूलों पर लागू किया गया है। इसके दायरे में यूपी, सीबीएसई, आईसीएसई बोर्ड के स्कूलों में लागू होगा।

विधेयक और हमारे नियम 2017 में अंतर
यूपी में लाए गए विधेयक में प्रतिवर्ष फीस बढ़ोत्तरी की सीमा तय की गई है, जबकि हमारे यहां इसका अधिकार राजस्थान विद्यालय फीस निर्धारण कमेटी को दिया गया है। कमेटी गठन के लचीलेपन का फायदा उठाकर निजी स्कूल अपने अनुसार ही फीस बढ़ोत्तरी करने में कामयाब हैं। वहीं विधेयक में शिकायत पर जुर्माने का प्रावधान है जबकि हमारे यहां ऐसा कोई नियम नहीं है। विधेयक में लिखा गया कि अगर स्कूल इमारत का अन्य व्यवसायिक गतिविधियों में उपयोग होगा तो उसकी आय स्कूल प्रबंधन की न होकर स्कूल की होगी, जिसे विद्यार्थियों की फीस में जोड़ा जाएगा। हमारे यहां ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है।