
फाइल फोटो पत्रिका
कुंभलगढ़। विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कुंभलगढ़ में इन दिनों होटल व्यवसाय बिजली निगम की कृपा दृष्टि का अनोखा अनुभव कर रहा है। हालात ऐसे हैं कि बिजली कब आएगी और कब चली जाएगी, इसका अनुमान लगाना मौसम विभाग की भविष्यवाणी से भी अधिक कठिन हो गया है। दूसरी ओर भूराजनीतिक परिस्थितियों के चलते पर्याप्त डीज़ल नहीं मिलने से होटल संचालकों की परेशानी और बढ़ गई है। क्षेत्र में बिजली संकट का असर लगभग 100 होटल, रिसॉर्ट और होम-स्टे पर पड़ रहा है। हालांकि पर्यटकों को इसका सीधा असर महसूस नहीं हो रहा, क्योंकि होटल संचालक भारी खर्च उठाकर जनरेटरों के माध्यम से बिजली व्यवस्था बनाए रखने को मजबूर हैं।
इसके चलते एक होटल को प्रतिमाह औसतन 2 से 7 लाख रुपए तक जनरेटर और डीज़ल पर खर्च करने पड़ रहे हैं। होटल व्यवसायियों का कहना है कि क्षेत्र में बिजली आपूर्ति अब सुविधा नहीं, बल्कि एक तरह का “सरप्राइज पैकेज” बन चुकी है। कभी कुछ घंटों के लिए दर्शन दे जाती है तो कभी लंबे अंतराल तक रूठी रहती है। लाइन में फॉल्ट आने पर निगम कार्यालय से संपर्क करने की कोशिश की जाती है, लेकिन फोन भी शायद बिजली की तरह ही कभी-कभार उपलब्ध रहता है। यदि फोन उठ जाए तो आश्वासन तुरंत मिल जाता है, लेकिन समाधान का इंतजार अक्सर अगले फॉल्ट तक जारी रहता है।
व्यवसायियों का कहना है कि पर्यटक कुंभलगढ़ की ऐतिहासिक विरासत देखने आते हैं, लेकिन होटल संचालकों को सबसे अधिक विरासत में जनरेटर का धुआं और डीज़ल का बिल मिल रहा है। लाखों रुपये का डीज़ल फूंकने के बाद भी बिजली व्यवस्था की स्थिति जस की तस बनी हुई है। ऐसे में मुनाफा कमाना तो दूर, खर्च निकालना भी चुनौती बन गया है।
होटल एसोसिएशन से जुड़े लोगों का कहना है कि बिजली संकट का मुद्दा लगभग हर प्रशासनिक बैठक, जनसुनवाई और सरकारी कार्यक्रम में उठाया जाता है, लेकिन अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाया है। उनका मानना है कि यदि स्थिति में सुधार नहीं हुआ तो इसका असर केवल होटल उद्योग तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि स्थानीय व्यापार, रेस्तरां, दुकानदारों, टैक्सी संचालकों और पर्यटन आधारित अन्य व्यवसायों पर भी पड़ेगा। व्यवसायियों का कहना है कि होटलों की आय लगातार प्रभावित होने से रोजगार पर भी असर पड़ सकता है। यदि संचालन लागत बढ़ती रही और आमदनी घटती रही तो होटलों को कर्मचारियों की संख्या कम करने अथवा वेतन संबंधी कटौती जैसे कदम उठाने पड़ सकते हैं।
होटल संचालकों का तंज है कि यदि यही स्थिति रही तो भविष्य में पर्यटन विभाग को कुंभलगढ़ के आकर्षणों की सूची में किला, वन्यजीव अभयारण्य और झीलों के साथ-साथ “24 घंटे चलने वाले जनरेटरों की गूंज” को भी शामिल करना पड़ सकता है। हालांकि निगम अधिकारियों का कहना है कि प्राकृतिक आपदाओं और आकस्मिक तकनीकी बाधाओं को छोड़ दिया जाए तो पिछले कुछ समय में क्षेत्र में औसतन 70 से 80 प्रतिशत बिजली उपलब्ध कराई जा रही है। वहीं क्षेत्र की दीर्घकालीन समस्या के समाधान के लिए 132 केवी विद्युत लाइन और गवार जीएसएस परियोजना पर कार्य चल रहा है, जिसके वर्ष 2027 तक पूर्ण होने की संभावना है।
अभी थोड़ा समय लगेगा। जब तक 132 केवी लाइन चालू नहीं होती और गवार जीएसएस नहीं बन जाता, तब तक थोड़ी-बहुत समस्या बनी रहेगी। तब तक हमारी पूरी कोशिश है कि क्षेत्रवासियों और होटल व्यवसायियों को विद्युत आपूर्ति में कोई बाधा उत्पन्न न हो। 132 केवी लाइन और गवार जीएसएस परियोजना 2027 तक पूर्ण होने की संभावना है।
-गजेंद्र चौधरी, कनिष्ठ अभियंता, एवीवीएनएल कुंभलगढ़
कुंभलगढ़ में बिजली की भारी समस्या है। जहां एक ओर डीज़ल मिल नहीं रहा, दूसरी तरफ बिजली आपूर्ति भी धोखा दे रही है। निगम वाले सुन नहीं रहे तो होटल व्यवसाय कैसे चले।
-गिरिराज सिंह राठौड़, होटल व्यवसायी, कुंभलगढ़
आजकल बिजली निगम घोषित कटौती दो घंटे करता है, लेकिन अघोषित कटौती 10 घंटे तक हो जाती है। अगर यही हालात रहे तो धीरे-धीरे क्षेत्र में होटल व्यवसाय बंद होने लगेंगे।
-शैतान सिंह राठौड़, होटल व्यवसायी, कुंभलगढ़
वास्तव में बहुत समस्या है। घोषित कटौती कम लेकिन अघोषित कटौती बहुत होती है। ऐसे में डीज़ल के धुएं और खर्च दोनों बढ़ रहे हैं। सरकार और जिम्मेदार विभागों को इस दिशा में गंभीरता से काम करना चाहिए।
-जमना शंकर आमेटा, पूर्व अध्यक्ष, होटल एसोसिएशन कुंभलगढ़
Published on:
02 Jun 2026 02:51 pm
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